नगर के पूर्वी बाईपास स्थित संत निरंकारी भवन में हुए
सत्संग में संत महात्माओं ने प्रवचन करते हुए सत्संग की महत्ता पर प्रकाश
डाला और कहा सत्संग से ही आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव है।
महात्मा
रामप्रकाश ने प्रवचन करते हुए कहा कि ज्ञानरूपी अनमोल रत्न को मानस संभाल
कर रखना, क्योंकि यह संसार माटी के समान है। एक दिन यहां से सब कुछ छोड़कर
ना चाहते हुए भी जाना होगा। उन्होंने कहा कि चाहे कितना बड़ा सम्राट क्यों न
हो या फिर गरीब और फकीर ही क्यों न हो सभी को जाना होगा।
यह नियति का खेल
है, पर हम अज्ञानी जीव इस तथ्य को भूल जाते हैं और सांसारिक वस्तु को अपना
समझकर अनमोल जीवन को माटी में मिलाते आ रहे हैं। अपने कर्तव्यों को भूलकर
अहंकार में जीवन जी रहे हैं।
कहा कि इसलिए संतों ने मनुष्य को सांसारिक
चकाचौंध से ज्ञान के प्रकाश से मनुष्य का जीवन जोड़ते हुए ईश्वर के दीदार
करा दिए और आत्मा का मोक्ष से सही मार्ग दर्शन कराया।
सुशील बाबू के संचालन
में हुए सत्संग में नरेश चंद्र वर्मा, राजकुमार गुप्ता, हरिराम, सुशांत,
आरपी सिंह, गंगादीन, रामरहीस, इंद्रपाल, जबर सिंह, गिरीश चंद्र, शशि
प्रभाकर, रश्मी, सृष्टि, रागिनी, विनीता, साधना, प्रिया, सरोजनी आदि ने भी
अपने भजनों और विचारों से संगत को निहाल किया।