कृषि प्रधान कन्नौज जिले में इस बार धनतेरस के पर्व
पर आलू की मंदी का असर छाया रहा। बाजारों में भीड़भाड़ तो खूब रही, लेकिन
बिक्री गत वर्ष के मुकाबले 20 से 30 फीसदी तक कम रही। किसानों की जेब हल्की
होने के कारण देर रात जब दुकानदार घरों के लिए रवाना हुए तो गत वर्ष के
मुकाबले उनकी जेबें भी कम भारी रहीं।
सोमवार को शहरी क्षेत्रों में
ज्यादा रौनक दिखी। नौकरीपेशा लोगों ने जमकर सामान खरीदा। व्यापार मंडल के
जिलाध्यक्ष अनिल गुप्ता ने बताया कि सरायमीरा, मकरंदनगर, तिर्वा रोड के
अलावा गुरसहायगंज, छिबरामऊ में मार्केट गुलजार रहा। नौकरीपेशा लोगों ने
कारें, बाइकें, सोने-चांदी के आभूषण से लेकर खानपान की वस्तुएं गत वर्ष के
मुकाबले ज्यादा खरीदीं।
पर दुकानदारों को गत वर्ष के मुकाबले कम फायदा हुआ,
क्योंकि ग्राहकों का ज्यादातर तबका ग्रामीण क्षेत्र से आता है, जिनकी
आमदनी का मुख्य जरिया खेती है। पहले सूखा, फिर ओलावृष्टि बारिश ने किसानों
को उजाड़ दिया। रही-सही कसर आलू सस्ते में बिकने से पूरी हो गई।
सर्राफा व
आलू व्यापारी घनश्याम वर्मा ने बताया कि आलू की हालत इस बार खस्ता है। आलू
की मंदी के कारण किसानों तो आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। इसका
असर मार्केट पर पड़ा। बर्तन गत वर्ष के मुकाबले सस्ती कीमतों पर बिके। इसके
बावजूद गत वर्ष की तुलना में कम लोग ही खरीदारी करने आए।
इसकी वजह किसानों
की माली हाल खस्ता होना बताया गया। उधर, सर्राफा यूनियन के पदाधिकारी
देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि गत वर्ष के मुकाबले सोने-चांदी की बिक्री
में 25 फीसदी गिरावट रही। तुलना करें तो करीब करीब 75 फीसदी दुकानदारी
हुई।
कन्नौज जिले में करीब 20 करोड़ रुपये धनतेरस के दिन सोने-चांदी के
आभूषणों का कारोबार होता है जो सिमटकर लगभग 15 करोड़ के आसपास पर आ पहुंचा।
दुकानदार रामशंकर ने बताया कि झाड़ू का स्टाक काम पड़ गया। पहले 15 रुपये
से बेंचना शुरू किया।
दोपहर बाद तक दाम 25 से 30 रुपये पहुंच गए। कुछ
घंटे बाद झाड़ू के रेट 40 रुपये तक पहुंचे। ताड़ वाली झाड़ू कम पड़ने पर
फूल वाली झाड़ू लोगों को खरीदनी पड़ी। बीते वर्ष झाड़ू कम बिकी थीं, पर इस
साल दो से तीन गुना बिक्री बढ़ गई, इसलिए माल कम पड़ गया।
ज्यादातर लोगों
ने आस्था के चलते महालक्ष्मी की कृपा होने व संपन्नता आने की मान्यता के
चलते ज्यादा झाड़ू खरीदीं। तिर्वा-कन्नौज रोड पर जब फुटपाथ पर जगह नहीं
मिली तो दुकानदारों ने निर्माणाधीन पुल के नीचे खाली पड़ी जमीन पर दुकानें
सजा लीं। खील खिलौने, गट्टे, दीये, मोमबत्ती आदि की दुकानें सजीं तो लोग भी
पहुंचे।
ग्राहक कम देख पिछले साल 100 रुपये किलो में बिकने वाली खील के
भाव 60 रुपये पर आ गए। वहीं गट्टा 50 रुपये से खिसकर 45 रुपये पर आ गया। इमरती
विक्रेताओं ने दाम बढ़ाए। गत वर्ष 110 रुपये में बिकी इमरती, अबकी 120
रुपये के रेट से बिकती नजर आई। बालूशाही के रेट में भी 60 रुपये से बढ़कर
70 रुपये किलो किए गए।