कन्नौज। कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी सेना की गोली से शहीद हुए जिले के लाल को रविवार को उसके पैतृक गांव में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। प्रशासनिक अधिकारियों, राजनीतिक हस्तियों के साथ-साथ हजारों लोग शहीद जवान को नमन करने पहुंचे।
जिला मुख्यालय से सटे गंगधरापुर गांव निवासी पंकज दुबे (20) पुत्र शांति स्वरूप दुबे सेना की आर्टीलरी 100 फिल्ड कोर में रेडियो आपरेटर था। जम्मू कश्मीर के तंगधार में 23 मार्च को सर्च आपरेशन के दौरान पाकिस्तान की ओर हुई गोलीबारी में उसके सिर में गोली लग गई थी। चार अप्रैल को इलाज के दौरान आर्मी हास्पिटल में पंकज ने दम तोड़ दिया था। शनिवार रात करीब एक बजे सेना के सूबेदार राकेश शहीद पंकज का शव लेकर गंगधरापुर पहुंचे। शव पहुुंचते ही परिवार में कोहराम मच गया। रविवार सुबह दस बजे गांव के पास एक प्राचीन टीले पर अंतिम संस्कार की तैयारी गई। सिखलाई फतेहगढ़ यूनिट के सूबेदार जगजीत के नेतृत्व में जवानों ने शहीद जवान को सलामी दी। शहीद पंकज को श्रद्धांजलि देने के लिए डीएम रवींद्र कुमार, एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह, एसडीएम शैलेष कुमार, सीओ श्रीकांत प्रजापति, सेवानिवृत्त सूबेदार शिव कुमार सिंह चंदेल, मेजर वीरेंद्र सिंह तोमर, सदर विधायक अनिल दोहरे, भाजपा प्रदेश मंत्री सुब्रत पाठक, पूर्व विधायक कलियान सिंह, बनवारी लाल दोहरे, नवाब सिंह यादव समेत कई राजनीतिक हस्तियां पहुंची। इस दौरान आसपास के गांव से आए हजारों लोगों ने जवान के अंतिम दर्शन किए। इसके बाद शहीद पंकज दुबे को बड़े भाई जवाहर दुबे ने मुखाग्नि दी।
शहादत हमेशा याद रहेगी
बचपन से ही पंकज हंसमुख था। जुझारू होने के साथ उसमें देशभक्ति को लेकर बड़ा जज्बा था। खेतीबाड़ी कर परिवार का जीवन-यापन होता था। पिता और बड़ा भाई जवाहर दिव्यांग है। सेना में भर्ती होने के लिए वह सुबह शाम घंटों पसीना बहाते थे। परिवार की आर्थिक हालत कमजोर होने के बाद भी पंकज ने हार नहीं मानी। शहर के सेठ बासदेव इंटर कालेज से 2014 में इंटर की परीक्षा पास की। इसके बाद आखिर 2017 में कानपुर में हुई आर्मी की भर्ती पास कर पंकज ने अपना मुकाम हासिल कर ही लिया था। पड़ोसी दीपक अग्निहोत्री, दिनेश चंद्र उर्फ गोटे, निर्मल तिवारी, वीरेश तिवारी, अजय अग्निहोत्री, ने बताया कि गांव का बहादुर बेटा पंकज गलियों में सिर्फ पैरों के निशान छोड़ गया। उसकी शहादत हमेशा याद रहेगी।
तीन साल तक जिले का चैंपियन रहा पंकज
शहीद पंकज को दौड़ का शौक था। इससे दोस्त उसे रेसर के नाम से भी पुकारते थे। 2014 से 2016 तक जिले में होने वाली जिला स्तरीय दौड़ प्रतियोगिताओं में पंकज का प्रथम स्थान आता था। लगातार तीन साल तक जिले के चैंपियन रहा। हाल में ही नौ जनवरी को छुट्टी पर आने के बाद पंकज ने बोर्डिंग मैदान में कबड्डी प्रतियोगिता में भाग लिया। पंकज के कमरे में करीब में 20 मैडल और शील्ड उसकी बहादुरी को बयां कर रहे हैं। गांव के दोस्त युवक मंगल दल के अध्यक्ष विवेक सैनी ने बताया कि पंकज अक्सर जीत के मैडल दोस्तों को दे देता खा। जब भी छुट्टी पर आता था, अधिकांश समय उनके साथ बिताता था। पंकज के शहीद होने से दोस्त राहुल, अंकुर, सोनू, अभिषेक, अनुज, जानू, सोनू ठाकुर, अभय कुशवाहा, रोहित कुशवाहा बेहद निराश दिखे।
अधूरे सपने लेकर विदा हो गया कलेजे का टुकड़ा
पंकज की बहादुरी और शहादत से परिवार का सीना चौड़ा है, लेकिन पंकज के अरमान और सपने अधूरे रहे गए। इसका परिजनों को बेहद मलाल है। पंकज के पिता शांति स्वरूप ने बताया कि सबसे छोटा बेटा दिल का कलेजा था। सिर्फ दो कमरे के मकान में उसका पालन हुआ है। पंकज का सपना मकान बनवाना था। पंकज के बड़े भाई जवाहर और रामू दुबे ने बताया कि पंकज ने स्वयं मकान का निर्माण शुरू कराया था। छुट्टी समाप्त होने के कारण पंकज बगैर छत डलवाए चला गया था। मां रमाकांती और बहन रुचि पंकज की मौत से बेसुध हैं। बहन रुचि ने बताया कि उसके भाई को गोली मारने वाले दुश्मनों के खिलाफ कार्रवाई हो तभी भाई की आत्मा की शांति मिलेगी।