नोटबंदी ने कस्बे के गजक कारोबार का स्वाद फीका कर दिया है। सर्दियों में गजक का बड़ा कारोबार होता था। इस बार खासी मंदी है। गैर जिलों से आर्डर नहीं मिल रहे हैं। लोकल मांग भी गिरी है। कारोबारियों को रकम फंसती दिख रही है। मांग न होने से कारीगर पलायन करने लगे हैं।
गजक का कारोबार दिसंबर से फरवरी तक बड़े पैमाने पर होता है। कस्बे में बनी गजक की फर्रुखाबाद, मैनपुरी, इटावा, हरदोई, शाहजहांपुर, कानपुर देहात आदि जिलों में खासी मांग रहती है। इन तीन माह में ही करीब 30 लाख से ऊपर का कारोबार होता है। नोटबंदी के बाद से गजक कारोबार पर संकट उतर आया। नगदी की किल्लत से इस बार बड़े आर्डर नहीं मिल रहे हैं। कारोबारियों ने माल तैयार कर लिया। अब यह इनके यहां डंप है। बिक्री पर मंदी से कारीगरों का भुगतान फंस गया। इससे यह काम छोड़ने लगे हैं। बजरिया मोहल्ले में रहने वाले गजक के बड़े कारोबारी शिवशंकर लाल कहते हैं कि इस बार 30 से 35 फीसदी कारोबार भी हो जाए तो बड़ी बात है।
खास आइटमों से बढ़ा कारोबार
कस्बे में गुड़ और चीनी की गजक के अलावा गटियां, पापड़ी, तिल के लड्डू, गुड़ पट्टी, तिल मेवा के समोसा, गजक रोल, खस्ता आदि खास आइटम बनते हैं। इससे यहां बनी गजक की मांग बढ़ी है। गजक कारोबारी धर्मपाल बताते हैं कि गजक का काम तीन महीने होता है। इन तीन माह में ही पूरे साल का खर्चा निकल आता था।
तबाह हो गया कारोबार
रोडवेज बस स्टेशन के पास दुकान किए गजक विक्रेता श्याम मनोहर बताते हैं कि नोटबंदी ने कारोबार तबाह कर दिया है। गैर जिलों से आर्डर बंद हैं। लागत भी निकलती नहीं लग रही है। शहर के पूर्वी बाईपास पर दुकान किए शिवम गुप्ता का कहते हैं कि कारीगरों का भुगतान करना भी मुश्किल है। भरतचंद्र हलवाई कहत हैं कि लोकल बिक्री भी में भी गिरावट आई है।
ऐसे तैयार होती है गजक
गजक गुड़, चीनी, तिल, मेवा आदि से बनती है। कारीगर बताते हैं कि गजक बनाने में खासी मेहनत करनी पड़ती है। पहले गुड़ या चीनी की चासनी तैयार की जाती है। तिल को धीमी आंच में भूना जाता है। इसके बाद तैयार चासनी की पट्टी खींची जाती है। इसमें भुने तिल मिलाकर कुटाई की जाती है। इसके बाद गजक तैयार होती है।