नोटबंदी के आदेश ने किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया। पुराने आलू का भाव गिरने से उसका खामियाजा नए आलू उत्पादक किसानों को भुगतना पड़ रहा है। जिला प्रशासन ने किसानों को राहत प्रदान करते हुए निकासी की तिथि तीसरी बार परिवर्तित करते हुए 30 दिसंबर निर्धारित कर दी है। यह फैसला किसानों के शीतगृहों से निकासी के लिए न पहुंचने के कारण लिया गया है।
नोटबंदी के फरमान ने सबसे अधिक चोट आलू किसानों को पहुंचाई है। पिछले दिनों आलू की मंडी में कुछ उछाल आया था। इस दौरान तमाम किसानों ने निकासी कर आलू की बिक्री कर ली, लेकिन ऐसे भी किसान रहे जो मंडी में दाम के उछाल का इंतजार कर रहे थे। किसानों का यह निर्णय उनके लिए काफी संकट भरा रहा।
मौजूदा समय में आलू के भाव लगातार गिरने से पुराना आलू माटी मोल बिक रहा है। पुराने आलू की मंडी पर यदि नजर दौड़ाई जाए तो 90 रुपये से लेकर 125 तक प्रति पैकेट आलू बिक रहा है। शीतगृहों में किसानों के न पहुंचने से सन्नाटा छाया हुआ है। शीतगृह मालिक सुबह से लेकर शाम तक किसानों से संपर्क साधकर उनसे निकासी करने को कह रहे हैं, इसके बावजूद कोई किसान नहीं पहुंच रहा।
नई कच्ची फसल के दाम भी लगातार गिर रहे हैं। नई कच्ची फसल का आलू ढाई सौ से तीन सौ रुपये पैकेट बिक रहा है। जिला उद्यान अधिकारी मुन्ना यादव का कहना है कि नोटबंदी के बाद निकासी की धीमी गति व किसानों को बाजार में भाव न मिलने से तीसरी बार समय सीमा में परिवर्तन करते हुए निकासी की तिथि तीस दिसंबर तक बढ़ा दी गई है।
उधर शीतगृह मालिकों का कहना है कि तिथि के लगातार बढ़ने से समस्याएं आएंगी। फरवरी में नया सीजन शुरू हो जाता है। समय बढ़ जाने से शीतगृह की सफाई समय पर नहीं हो सकेगी। जिस कारण पक्की फसल की आलू खुदाई होने पर शीतगृहों में देरी से भंडारित हो सकेगा।