हंसलोक जनकल्याण समिति के तत्वावधान में कैलाश
मार्केट में आयोजित सत्संग में महात्मा राधेश्याम ने कहा कि मानव भौतिक सुख
साधन कितने भी जुटा ले पर बिना गुरु के कल्याण संभव नहीं है। गोस्वामी
तुलसीदास ने कहा भी है कि बिन गुरु भव निधि तरै न कोई जो विरंचि शंकर सम
होई।
उन्होंने कहा कि मोहरूपी अंधकार को सूर्यरूपी सद्गुरु ही दूर कर
सकते हैं। उन्होंने भजन राम नाम के हीरे मोती संत बांट रहे गली-गली सुनाया।
रामसनेही शर्मा ने कहा कि भौतिक जगत में भजन कीर्तन से मन को एकाग्र करने
का प्रयास किया जाता है। कहा कि आध्यात्मिकता में भक्ति भावना जागृत करने
के लिए मन को अंतर्मुखी होना पड़ेगा।
उन्होंने भजन सुमिरण करो दिन रात नहीं
तो मन रोवेगा सुनाकर भक्ति भावना को नई चेतना प्रदान की। प्रधानाध्यापक
सतीश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि भक्ति मार्ग की सफलता सद्भावना, प्रेम और
सौहार्द पर निर्भर है। विद्वानों का कहना है कि प्रेम ही ईश्वर है और जहां
पर प्रेमी जन एकत्र होकर प्रभु का गुणगान करते हैं, वहां अमृत रूपी प्रेम
की गंगा प्रवाहित होती है।
उन्होंने भजन ज्योति से ज्योति जलाते चलो प्रेम
की गंगा सुनाते चलो सुनाकर वाहवाही लूटी। महिपाल सिंह, बाबा जिलेदार सिंह,
पूजा शर्मा, गीता पाठक, रामचंद्र, रूपलाल ने भी भजन गंगा में गोते लगवाए।
नत्थू सिंह के संचालन में हुए कार्यक्रम का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण से
हुआ।