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‘मित्रता हो तो कृष्ण-सुदामा जैसी’

Mon, 15 Feb 2016 12:08 AM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
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गांव गोवर्धनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन वृंदावन के कथा प्रवक्ता बालसुख आनंदस्वरूप महाराज ने कृष्ण और सुदामा के पुनर्मिलन का प्रसंग सुनाया और कहा कि मित्रता हो तो कृष्ण और सुदामा जैसी, जिसमें अमीर और गरीब का अंतर न हो।
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उधर, अंबिका पथवारी देवी मंदिर में आयोजित भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार को स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ सरस्वती ने कहा कि बिल्ली चूहे को खा जाती है, ऐसे ही वासना जीव को खा जाती है और मोक्ष की ओर जाने नहीं देती। बालसुख ने कहा कि कृष्ण और सुदामा की मित्रता समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणादायक है।

कृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा बुढ़ापे में जब द्वारिकाधीश से मिलने गए तो वह नंगे पैर दौड़कर स्वागत करने पहुंचे। प्रभु ने गले लगाकर अपने नेत्रों के आंसुओं से उनके पैर धोए। उन्होंने कहा कि आज के दौर में उच्च पद पर पहुंच जाने के बाद लोग अपने मां,बाप, सगे संबंधियों तक को पहचानने से इनकार कर देता है जो घोर अधर्म है।
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ऐसे लोगों पर भगवान की कृपा नहीं रहती। सोमवार को कार्यक्रम स्थल पर विशाल भंडारा होगा। इस मौके पर सुधीर चतुर्वेदी, शंभू प्रकाश चतुर्वेदी, सुमित शुक्ला, लोकेश मिश्रा, जयशंकर सिसौदिया, अरुण दोहरे, अवधेश चतुर्वेदी, दीपक दुबे, आशीष चतुर्वेदी और सौरभ तिवारी आदि मौजूद थे।

उधर, अंबिका पथवारी देवी मंदिर (भूड़ा) में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार को शंकराचार्य मठ भानुपुरा पीठ के युवाचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ सरस्वती ने कहा कि बिल्ली चूहे को खा जाती है, ऐसे ही वासना जीव को खा जाती है और मोक्ष की ओर जाने नहीं देती।

स्वामी जी ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को चार पुरुषार्थ बताते हुए कहा कि यह चारों पुरुषार्थ एक दूसरे के विरोधी भी होते है। अर्थ का गरुण वर्ग है मोर, धर्म का गरुण वर्ग सर्प है। मोर सांप को खा जाता है, ऐसे ही अर्थ का लोभी धर्म को खा जाता है। ऐसे ही काम का गरुण वर्ग बिल्ली है और मोक्ष का गरुण वर्ग चूहा है।

युवाचार्य ने कहा कि जब कोई घटना घटित होती है तो उसको इतिहास कहते हैं, वही घटना लोक जगत में शिक्षा के निमित्त वर्णन की जाती है, उसे पुराण कहते हैं। कहा कि लोहे की कील पानी में डूब जाती है, किंतु वही कील जब नाव में लगती है तो तैरती है।

ऐसे ही शरीर भव सागर में सत कर्म में लगता है तो पार हो जाता है। कहा कि भगवान नारायण ने ब्रह्माजी के प्रति उपदेश किया कि उसी का नाम भागवत है। कथा को सुनने के लिए बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ी।
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