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गंगा घाट किनारे जला नहीं, दफना रहे अपनों के शव

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कन्नौज/मानीमऊ। गंगा की तलहटी में शव जलाने के साथ दफन किए जा रहे हैं। गहराई कम होने से कुत्ते नोच रहे हैं। शुक्रवार दोपहर करीब डेढ़ बजे अमर उजाला टीम गंगा की तलहटी में पहुंची तो नजारा देखकर दंग रह गई। शवों को जलाने के साथ दफन किया जा रहा था। कुत्ते इन शवों को नोच रहे थे। इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था।
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गंगा के दूसरी ओर हरदोई जनपद की ओर शवों को दफन किया जा रहा है। जगह-जगह शव कतार में दफन हैं। इनकी संख्या 40 से अधिक दिखी। इन पर फूल माला के अलावा अगरबत्ती भी जली थीं। कुछ कब्र खुल गई हैं। इन्हें कु त्तों और जंगली जानवरों ने खोला है। अब तक गंगा में केवल बच्चों के शव दफन किए जाते रहे हैं। अन्य शवों को जलाया जाता है। अब यहां का नजारा अलग है। लोग शव जलाने के बजाय तीन फीट गड्ढा खोद कर दफन कर रहे हैं।
इलाकाई लोगों के मुताबिक लकड़ी के अभाव में लोग शव दफन कर हैं। दफन शवों को कुत्ते और कौए खाते रहते हैं। शव गंगा किनारे पड़े होने के बाद भी प्रशासन रोक नहीं लगा पा रहा है। शुक्रवार को भी लोग गंगा किनारे रेत में शव दफन करते रहे। दूसरी ओर इसी रेती का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें कुछ लोग रेत खोदकर शव दफन कर रहे हैं। एक युवक पीपीई किट पहने खड़ा है। ऐसे में संक्रमितों के शव दफन करने की आशंका भी है।
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वहीं जिलाधिकारी राकेश कुमार मिश्र का कहना है कि कोविड के चलते उन्हें इसकी जानकारी नहीं हो पाई है। अब वह ठीक हो गए हैं। उपजिलाधिकारी को भेजकर जांच कराएंगे। अगर ऐसा है तो लोगों को रोका जाएगा।
अंतिम संस्कार में लगती ढाई से तीन क्विंटल लकड़ी
आमतौर पर एक शव को जलाने में ढाई से तीन क्विंटल लकड़ी लगती है। इसका मूल्य छह से आठ रुपये प्रति किलो है। कोरोना काल से पहले यह मूल्य तीन से चार रुपये था। इसके अलावा घी, शक्कर, तिल, पान, धूप, चंदन लकड़ी आदि मिलाकर करीब 1000 रुपये का खर्च होता था। अब यह बढ़कर डेढ़ से दो हजार रुपये हो गया है। इसके इतर बांस व कफन में करीब तीन सौ रुपये लगते थे। अब बढ़कर पांच सौ रुपये तक हो गए हैं।
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