फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विलुप्त हुई सारस की क्रेन प्रजाति

Tue, 23 Feb 2016 11:54 PM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
विज्ञापन
विज्ञापन
सूबे के सीएम अखिलेश यादव भले ही सारस संरक्षण के प्रति चिंतित हों और सैफई में इंटरनेशनल सारस कांफ्रेंस करके संरक्षण की योजना बनाई हो, पर सारस की एक प्रजाति क्रेन (साइबेरियन) पूर्णत: विलुप्त हो चुकी है। कन्नौज में सारस की संख्या वर्ष 15 की गणना में 445 थी, जिससे जिला सूबे तीसरे स्थान पर है, पर अब क्रेन सारस यहां दिखाई नहीं पड़ता, जबकि पिछले वर्षों में तमाम क्रेन सारस यहां आते थे।
विज्ञापन


सारस विश्व का सबसे विशाल उड़ने वाला पक्षी है। इस पक्षी को क्रौंच के नाम से भी जानते हैं। प्रदेश में इसकी संख्या अधिक होने पर इसे राजकीय पक्षी घोषित किया गया था। इस राजकीय पक्षी को मुख्यत: गंगा के मैदानी भागों और भारत के उत्तरी और उत्तर पूर्वी और इसी प्रकार के समान जलवायु वाले अन्य भागों में देखा जा सकता है।

पूरे विश्व में इसकी कुल आठ जातियां पाई जाती हैं। इनमें से पांच भारत में पाई जाती हैं, जिसमें चार स्थायी प्रजाति है और पांचवीं साइबेरियन क्रेन है, जो सितंबर में यहां प्रजनन के लिए आता है और फरवरी के अंत में चला जाता है। छह महीने तक यह क्रेन प्रजाति भारत में रहती है, पर बीते वर्षों से इस प्रजाति का कोई पता नहीं है।
विज्ञापन


वैैश्विक स्तर पर इसकी संख्या में हो रही कमी को देखते हुए इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्वर्जन ऑफ नेचर संस्था ने इस प्रजाति के साथ सारस की अन्य प्रजाति को भी संकटग्रस्त घोषित किया है। संस्था ने कहा था कि अगर समुचित प्रयास संरक्षण के लिए न हुए तो क्रेन के साथ अन्य प्रजाति भी विलुप्त हो जाएगी।

संस्था के अनुसार मलेशिया, फिलीपीन्स और थाइलैंड में सारस पक्षी की यह जाति पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी है। सारस की क्रेन और अन्य प्रजाति के विलुप्त होने के पीछे  सिमटते जंगल, कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग और तेजी से बदलता पर्यावरण और बढ़ता प्रदूषण भी इसके लिए जिम्मेदार है।

इसके अतिरिक्त इनके शिकार एवं अंडो तथा चूजों की तस्करी की बातें सामने आ चुकी है। उड़ीसा, मध्य प्रदेश, बिहार और गुजरात की कुछ जनजातियां इनका शिकार करती हैं। इन स्थानों पर भी ये विलुप्त प्राय हैं। उधर, राजस्थान में क्रेन सारस को कुरजां नाम से भी जाना जाता है। यहां लोक गीतों में कुरजां के महत्व को उकेरा गया है।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें