कन्नौज। लोकसभा चुनाव के लिए देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और सूबे की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी के बीच हुए गठबंधन से एक बात तय हो गई है कि इत्रनगरी के सियासी दंगल में एक बार फिर हाथ का पंजा नहीं दिखेगा।
गठबंधन के तहत मिली सीट में कांग्रेस के हिस्से कन्नौज नहीं है। कांग्रेस को आखिरी बार 40 साल पहले 1984 में जीत मिली थी। तब शीला दीक्षित पहली बार सांसद बनी थीं। उसके बाद कभी इस सीट पर कांग्रेस को जीत नसीब नहीं हुई। वर्ष 2004 के बाद से यहां कांग्रेस की ओर से दावेदारी भी नहीं की जाती है।
रायबरेली और अमेठी में सपा की ओर से प्रत्याशी नहीं उतारे जाने के बदले में कांग्रेस भी यहां से उम्मीदवार उतारने से परहेज करती रही है। इस बार तो बाकायदा गठबंधन ही हुआ है। वर्ष 2000 में हुए उपचुनाव से अब होने जा रहे पांचवें चुनाव में सिर्फ एक बार वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार यहां सामने आया था। उसके बाद से हर चुनाव में यह सीट दोस्ती निभाती आ रही है। रायबरेली में सोनिया गांधी और अमेठी में राहुल गांधी के समर्थन में बिना गठबंधन के ही सपा की ओर से उम्मीदवार नहीं उतारा गया है। कांग्रेस भी दोस्ती निभाते हुए कन्नौज के दंगल से दूर रहती है। चूंकि इस बार बाकायदा गठबंधन हुआ है, ऐसी सूरत में यह सीट सपा के हिस्से में है। कांग्रेस के प्रदेश सचिव विजय मिश्र कहते हैं कि कांग्रेस के सभी कार्यकर्ता उत्साहित हैं। वह गठबंधन के उम्मीदवार को जिताने में पूरा जोर लगाएंगे।
वष 1967 के लोकसभा चुनाव से अस्तित्व में आई कन्नौज लोकसभा सीट के लिए अब तक हुए चुनाव में सिर्फ दो ही बार ऐसा मौका आया है, जब कांग्रेस को यहां कामयाबी मिली है। कांग्रेस को पहली बार यहां जीत वर्ष 1971 के चुनाव में मिली थी, तब पार्टी उम्मीदवार एसएन मिश्र सांसद चुने गए थे। उन्होंने तब जनसंघ के उम्मीदवार रामप्रकाश त्रिपाठी को शिकस्त दी थी। दूसरी बार कामयाबी वर्ष 1984 के चुनाव में मिली थी। तब पार्टी के टिकट पर शीला दीक्षित ने तत्कालीन संसद व लोकदल के प्रत्याशी छोटे सिंह यादव को हराया था। वर्ष 1989 के चुनाव में शीला दीक्षित सीट बरकरार रखने में नाकाम रही थीं। छोटे सिंह यादव ने 1984 में मिली हार का बदला लेकर उन्हें सियासी शिकस्त दी थी।
कांग्रेस ने इस सीट पर आखिरी बार 2004 में उम्मीदवार उतारा था। विनय शुक्ला उम्मीदवार थे। उन्हें उस चुनाव में 10501 वोट ही मिला था। लिस्ट में चौथा नंबर हासिल हुआ था। उस चुनाव में सपा के अखिलेश यादव लगातार दूसरी बार यहां से सांसद निर्वाचित हुए थे। उन्होंने तीन लाख से ज्यादा वोट से जीत हासिल की थी।