कर्फ्यू का एनाउंस होने और दंगे को काबू में करने के
लिए बीएसएफ के जवान आते ही शहर में टेरर कायम हो गया। शासन ने शहर में हुए
दंगे को गंभीरता से लेते हुए लखनऊ से बीएसएफ तत्काल रवाना की। एसपी कलानिधि
ने बताया कि पीएसी के अलावा एक कंपनी बीएसएफ मंगाई गई है।
बीएसएफ के
आने के बाद चौतरफा सन्नाटा छा गया। घरों के बाहर व गलियों में मौजूद लोग
आनन-फानन में सामान समेटकर अंदर भाग गए। कुंडी बंद कर ली। वहीं दुकान सजाए
बैठे लोग भी अपना सामान उठाकर दुकान के अंदर रखने लगे। सरायमीरा कन्नौज
रोड, मकरंदनगर कन्नौज रोड, सरायमीरा जीटी रोड पर भी खुलीं दुकानें बंद हो
गईं।
चंद मिनटों के अंदर गलियां सुनसान हो गईं। पुलिस की कारें माइक पर
कर्फ्यू लग जाने का एनाउंस करते हुए घरों से बाहर न निकलने की चेतावनी देते
घूम रही थीं। कई जगह खड़े युवकों को भी पुलिस ने लठिया कर खदेड़ दिया।
वहीं रिश्तेदारी में जा रहे तमाम लोगों को वापस घर जाने की सलाह देकर लौटा
दिया गया।
वहीं खाद्य पदार्थ बेंचने वाले दुकानदारों को भारी नुकसान हुआ। मिठाई,
समोसे, पकौड़ा, दही, चाय आदि के विक्रेताओं का दूध खोया आदि मैटेरियल खराब
भी हुआ। वहीं रोज कमाने-खाने वालों को भी मकानों का निर्माण कार्य में लगे
मिस्त्री व मजदूरों को भी काम बंद करके भागना पड़ा।
उधर, नवदुर्गा उत्सव
पंडालों में स्थापित मूर्तियों की विसर्जन यात्रा के दौरान हुई घटना के बाद
मांगों को लेकर धरने पर बैठे समिति के लोगों पर प्रशासन ने मूर्ति विसर्जन
करने के लिए पहले अपने ढंग से दबाव बनाया। नहीं मानने पर रात्रि एक बजे के
बाद डीएम, एसपी ने पहुंचकर मोर्चा संभाला और लोगों को बल प्रयोग करते हुए
वहां से खदेड़ दिया।
इसके बाद प्रशासन ने अपनी देखरेख में मूर्तियों को
सलेमपुर गांव में करीब तीन बजे के पहुंचाया, जहां ब्रह्म मुहूर्त में
मूतिर्यों का विसर्जन आचार्यों के माध्यम से कराया गया। मूर्तियों के
विसर्जन को लेकर ग्वालमैदान में पर धरने पर बैठे लोगों को समझाने का बीती
रात्रि कई बार प्रयास चले, पर उन्होंने प्रशासन की एक न सुनी।
रात ज्यादा
होने पर आयोजकों की ओर से साथ में आए लोगों के लिए तहरी भी बनवाई गई। इस
दौरान प्रशासन ने मूर्तियों को आगे बढ़ाने के लिए सारे प्रयास किए, पर सब
निरर्थक साबित हुए। तमाम चालक अपनी ट्रालियों को छोड़कर इंजन लेकर गायब हो
गए। प्रशासन ने रात्रि में ही दूसरे इंजन व चालकों की व्यवस्था कराई। इसके
बाद घरों से आचार्यों को बुलाया गया। जिसके बाद मूर्तियों को रात्रि तीन
बजे सलेमपुर नदी पर पहुंचाया गया। जहां पर मूर्तियों का विसर्जन हुआ।