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पहले भी कई बार बह चुका खून

Thu, 22 Oct 2015 11:59 PM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
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शहर में इससे पहले भी सांप्रदायिक झगड़ों के दौरान खून बह चुका है। हर बार छोटी सी घटना उग्र रूप ले लेती है। उपद्रवी तत्वों की नापाक हरकतों के कारण बेकसूर लोगों को कभी घायल होकर तो कभी जान देकर खामियाजा भुगतना पड़ता है।
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ज्ञात हो कि दो दशक पहले लाखन चौराहे के पास ही विवाद के दौरान कल्लू पठान की मौत हो गई थी। इसके कई वर्ष बाद बदले की भावना से आरएसएस से जुड़े हरी गुप्ता की हत्या की गई। इन दोनों घटनाओं के कारण कई महीनों तक शहर में तनातनी का माहौल रहा। इसके बाद कई सालों तक शांति रही।

दो साल पहले मकरंदनगर में क्रिकेट खेलने को लेकर दो युवाओं के गुट भिड़ गए। इसके बाद एसवीएस कालेज गेट के पास समोसे की दुकान फूंककर लूटपाट की गई। बाद में दो संप्रदाय के लोग आमने-सामने हुए तो मारपीट व ईंट-पत्थर चले। इसी तरह करीब दो साल पहले शोभायात्रा में छेड़खानी को लेकर मोहल्ला चिरैयागंज में मारपीट व फायरिंग हुई।
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साढ़े तीन वर्ष पहले नगर पालिका चुनाव के दौरान टेलीफोन एक्सचेंज के सामने पथराव हुआ था। वहीं मोहल्ला बगिया फजल इमाम में मारपीट फायरिंग के दौरान एक युवक गोली लगने से घायल हो गया था। करीब तीन महीने पहले मोहल्ला अजयपाल रोड में एक दुकान को खाली कराने को लेकर विवाद ने सांप्रदायिक रंग लिया था।

तब भी मारपीट के बाद पथराव व फायरिंग हुई थी, जिसमें मोहल्ला बगिया फजल इमाम निवासी एक युवक की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग घायल हुए थे। उधर, गुरुवार की घटना के बाद माहौल को शांत करने के लिए अपर जिलाधिकारी रमेश चंद्र यादव, एसडीएम सदर सुनील शुक्ला लाखन चौराहा पर पहुंचे।

वहां कटरा मोहल्ला के पास भीड़ लगी देखकर दोनों अफसर पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। भीड़ को समझाते हुए घर जाने की बात कही तो युवक भड़क गए और पुलिस को खरीखोटी सुनाने लगे। उधर, शहर का माहौल दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा है। इसके बावजूद दिलों में व्याप्त नफरत के जहर को कम करने के कोई ठोस प्रयास नहीं होते हैं।

ज्ञात हो कि हर त्योहार से पहले कोतवाली में शांति कमेटी की बैठक बुलाई जाती है। इसमें चुनिंदा लोग ही नजर आते हैं। वहीं लोगों के बीच गहरी पैठ रखने वाले लोगों से पुलिस दूरी बनाए रहती है। अधिकारी भी भाषणबाजी करके दायित्व से इतिश्री कर लेते हैं।

शांति कमेटी की बैठक बेहतर ढंग से करने और दोनों संप्रदायों के ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाने में हो रही कोताही आपसी भाईचारे की भावना को पैदा करने में बाधक बनी है। आमने-सामने बैठकर बातचीत का दौर काम होने से तनातनी बढ़ती ही जा रही है।
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