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Kannauj News: जेल अधीक्षक के निलंबित होने के बाद खुल रहीं भ्रष्टाचार की परतें

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जलालाबाद। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक ओर जीरो टॉलरेंस की नीति और सादगी का दावा कर रही है, वहीं कन्नौज जिला कारागार के जेल अधीक्षक भीमसेन मुकंद इन दावों की धज्जियां उड़ाने में मसरूफ हैं। ताज़ा मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जेल के भीतर न केवल बंदियों के पेट पर डाका डाला जा रहा है, बल्कि सरकारी धन का उपयोग निजी ऐश-ओ-आराम और रसूख दिखाने के लिए किया जा रहा है। अब निलंबित होने के बाद भ्रष्टाचार की परतें अब खुलने लगीं हैं। यह उसकी एक बानगी मात्र है।
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कैदियों के निवाले पर डाका: राशन में लाखों का वारा-न्यारा



जिला कारागार में बंद कैदियों के भोजन के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, जेल में बंदियों के लिए आने वाली दाल, आटा और चावल की कागजी मात्रा और वास्तविक खपत में जमीन-आसमान का अंतर है। सरकारी रिकॉर्ड में राशन की खपत कई गुना ज्यादा दिखाई जा रही है, जबकि हकीकत में बंदियों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों संदिग्ध हैं। राशन के इस हेरफेर में हर महीने लाखों रुपये का गबन किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करता है।



सुंदरीकरण के नाम पर ''''''''कमीशन'''''''' का खेल

पिछले वर्ष शासन द्वारा जेल के सुंदरीकरण के लिए करीब 1.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की गई थी। आरोप है कि इस धनराशि का उपयोग जेल की व्यवस्था सुधारने के बजाय अधीक्षक ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए किया। उन्होंने अपने कार्यालय को दो बार तुड़वाकर आलीशान तरीके से बनवाया। इतना ही नहीं, जेल के भीतर कई मजबूत द्वारों को बेवजह तुड़वा दिया गया है ताकि नए निर्माण के नाम पर बजट खपाया जा सके।
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मोटा कमीशन बना था शौक



जेल के बाहर अंडरग्राउंड वायरिंग और लाइटिंग का काम भी जोर-शोर से चल रहा है। जानकारों का कहना है कि सुंदरीकरण के इन फिजूलखर्ची वाले कामों के पीछे का असली मकसद ''''''''मोटा कमीशन'''''''' डकारना है। जितना ज्यादा निर्माण कार्य होगा, उतनी ही बड़ी रकम कमीशन के तौर पर जेब में जाएगी।

लग्जरी गाड़ी पर नीली बत्ती रही बरकरार

भाजपा सरकार ने वीआईपी कल्चर को जड़ से खत्म करने के लिए अधिकारियों और नेताओं की निजी गाड़ियों से नीली और लाल बत्ती हटाने के सख्त निर्देश दिए हैं। लेकिन कन्नौज जेल अधीक्षक पर शासन के इन आदेशों का रत्ती भर भी असर नहीं है। वे अपनी निजी लग्जरी गाड़ी में आज भी बेखौफ होकर नीली बत्ती लगाकर घूमते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उनके उस रसूख को भी दर्शाता है जिसके दम पर वे अब तक कई जांचों से बचते आए हैं।

विवादों से पुराना नाता है अधीक्षक का



गौरतलब है कि भीमसेन मुकंद का करियर ही विवादों की बुनियाद पर टिका है। मथुरा में मूर्तियों के गायब होने का मामला हो, फतेहगढ़ में वार्डन की मौत का प्रकरण हो या गौतमबुद्ध नगर में अवैध वसूली का विरोध—मुकंद हर जगह चर्चा में रहे हैं। बार-बार होते स्थानांतरण और निलंबन के बावजूद उनकी कार्यशैली में कोई सुधार नहीं आया है।
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अब देखना यह है कि क्या शासन इन गंभीर आरोपों का संज्ञान लेकर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा।
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