कन्नौज/मानीमऊ। हर बार की तरह इस बार मटर किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित नहीं हो सकी। तापमान का कम और ज्यादा होना फसल पर रोग का कारण बन गया। देर से बाजार में पहुंची जिले की मटर ने पहले ही किसानों को नुकसान पहुंचा दिया, अब जब लागत निकालने का समय आया तो दाम इतने गिरे की थोक बाजार में पांच रुपये किलो का भाव मिलना मुश्किल हो रहा है। जिले में करीब 23 सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में मटर की फसल बोई गई है।
इस बार मटर के रकबे में करीब तीन सौ हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई थी। किसानों को हर बार की तरह इस बार भी अच्छा मुनाफा होने की उम्मीद थी। लेकिन, देर तक हुई बारिश के कारण आलू और मक्का की फसल से खेत देर से खाली हुए। हर बार सितंबर तक बोई जाने वाली मटर इस बार सितंबर के अंतिम सप्ताह और अक्तूबर के पहले सप्ताह में बोई गई। यही कारण रहा कि अगेती फसल बाजार में नहीं आ सकी। जिले की मटर जब बाजार पहुंची तो बुंदेलखंड की फसल का बाजार पर कब्जा था। शुरुआती दौर होने से किसानों को फिर भी 250 से 300 रुपये प्रति पांच किलो के भाव मिल गए। लेकिन, दिसंबर के मध्य तक मटर के भाव तेजी से गिरना शुरू हो गए और यह सौ रुपये प्रति पांच किलो तक पहुंच गए। जनवरी में हालत और खराब हुई और दाम 30 से 40 रुपये प्रति पांच किलो हो गए। वर्तमान में 20 से 25 रुपये प्रति पांच किलो के भाव से मटर थोक बाजार में बिक रही है। मटर के दामों में हुई गिरावट ने किसानों को तगड़ा झटका दिया। भाव न मिलने से परेशान किसानों पर मौसम की मार पड़ी। तापमान में उतार-चढ़ाव होने के कारण फसल पर फली छेदक रोग लग गया। नया फूल न बनने के कारण पैदावार प्रभावित हुई। मानीमऊ के किसान सुरेश कुमार, दिनेश, अरविंद और राजकुमार ने बताया कि इस बार प्रति बीघा करीब छह से सात हजार रुपये लागत आई थी, जिसे निकालना मुश्किल हो रहा है।
कृषि विज्ञान केंद्र अनौगी के प्रभारी वैज्ञानिक डा. वीके कनौजिया ने बताया कि सुबह और शाम को ज्यादा ठंड होने और फिर दिन में तेज धूप निकलने से फसल को नुकसान होता है। इस बार ऐसा ही हुआ। कभी तेज धूप निकली तो कभी धूप के दर्शन तक नहीं हुए। यही कारण रहा कि मटर की फसल पर रोग पनप गया। अभी भी किसान यदि सही उपचार करे तो कुछ हालत सुधर सकती है। मटर की बेल्ट कही जाने वाली मानीमऊ क्षेत्र में इस बार बाहरी व्यापारियों की आमद भी कम रही। यही कारण रहा कि किसानों को फसल के अच्छे दाम नहीं मिल सके। हर बार कानपुर के अलावा हरदोई तक के व्यापारी यहां बड़ी संख्या में पहुंचते थे। प्रतिस्पर्धा होने के कारण दाम अच्छे मिल जाते थे। मटर की अगेती फसल बाजार में आने पर किसानों को 500 रुपये प्रति पांच किलो तक के भाव मिलते थे। हर बार दीवाली तक जिले की मटर बाजार में आ जाती थी लेकिन इस बार फसल नवंबर के मध्य और अंतिम सप्ताह तक बाजार में पहुंच सकी। यही कारण रहा कि किसानों को मन मुताबिक दाम नहीं मिल सके।