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युवाओं को लुभा रही ‘बापू’ की खादी

Fri, 02 Oct 2015 02:22 AM IST
ब्यूरो
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झांसी। आजादी के आंदोलन में चर्चित हुई बापू की खादी आज भी युवाओं को लुभा रही है। कॉटराइज और ब्रांडेड कपड़ों के बीच खादी अपनी जगह बनाए हुए है। हालांकि, महिलाओं को खादी की साड़ी नहीं लुभा पा रही है। पिछले दो वर्षों में झांसी व ललितपुर जिले में खादी की सूती साड़ियां नहीं बिकी हैं।
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गुलामी के दौर में महात्मा गांधी ने लोगों को आजादी दिलाने के साथ-साथ स्वावलंबी बनाने के लिए भी आंदोलन चलाया था। देशवासियों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए उन्होंने लोगों को चरखा और तकली चलाना सिखाया था। गांधी जी खुद भी अपने हाथ से काते हुए सूत के बने कपड़े पहनते थे। उस समय अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बनी खादी आजाद भारत में नेताओं की पहचान बन गई है। युवाओं को भी खादी खासी लुभा रही है। यही वजह है कि खादी के वस्त्रों की बिक्री में तेजी आ रही है।

झांसी व ललितपुर जिले में खादी की आपूर्ति करने वाली संस्था श्री गांधी आश्रम जैतपुर, जिला महोबा की बिक्री में काफी उछाल आया है। वर्ष 2014-15 में संस्था की बिक्री में 7,09,500 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है। इसी वर्ष अप्रैल व मई माह में ‘पोली’ वस्त्र की बिक्री 3,94,390 रुपये की हुई। ‘पोली’  शर्ट का कपड़ा है, जो युवाओं को खूब लुभा रहा है। वहीं खादी की सूती साड़ी की बिक्री में कमी आई है। साड़ी की बिक्री 3,09,178 रुपये से घट कर 2,82,140 रुपये रह गई है।
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श्री गांधी आश्रम खादी भंडार मानिक चौक के प्रबंधक उमेश कुमार अग्रवाल बताते हैं कि सूती साड़ियों की पहले बहुत मांग रहती है, जो पिछले कुछ वर्षों में घटी है। मांग न होने के कारण पिछले दो वर्षों से सूती साड़ियों का स्टॉक नहीं मंगाया है। हालांकि, खादी की रेशमी साड़ियों की बिक्री ठीक-ठाक हो जाती है। सूती साड़ियों को पूछने वाला कोई नहीं है।


वस्त्र नहीं विचार है खादी
खादी सिर्फ एक वस्त्र नहीं,  विचार भी है। खादी को गरीब लोग अपने हाथ से सूत कातकर बनाते हैं। खादी की खरीद से मिलने वाले पैसे से इन लोगों के घरों का चूल्हा जलता है। भाजपा नेता रत्नेश तिवारी का मानना है कि खादी पहनने से आत्मिक शांति मिलती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खादी अपनाने की अपील से भी लोगों का रुझान इसके प्रति बढ़ा है।

सबसे ज्यादा बिकती है सदरी
खादी की सदरी लोगों को खूब भाती है। सदरी की खरीद युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक करते हैं। वहीं खादी के रजाई, गद्दे, शॉल, चादर, लोई व कंबल की बिक्री भी काफी होती है।

कमीशन भी है कारण
खादी की साड़ियों की मांग न होने के पीछे बहुत बड़ा कारण कमीशन भी है। एक खादी आश्रम के प्रबंधक ने बताया कि पहले नगर निकायों में महिला कर्मियों को सूती साड़ी दी जाती थीं। लेकिन, खादी आश्रम से निकायों के खरीदारों को कमीशन नहीं मिलता है, इसलिए उन्होंने सूती साड़ी खरीदना बंद कर दी है।
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