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बीटी चावल पर शोध पूरा, उत्पादन जल्द

Tue, 07 Nov 2017 01:07 AM IST
lalitpur
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BT Rice Workshop - फोटो : demo pic
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भागलपुर के तिलका मांझी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. आरएस दुबे ने कहा कि बीटी कॉटन, बीटी मक्का, बीटी बैंगन से उत्पादन में आशातीत वृद्धि हो रही है। बीटी चावल पर शोध पूरा हो चुका है। जल्द ही इसका उत्पादन शुरू हो जाएगा। जैव रसायन का उपयोग खाद्यान्न उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण, नदियों की सफाई आदि में अहम भूमिका निभा सकता है। वह बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में जैव रसायन संस्थान द्वारा स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं कृषि क्षेत्र में बायोकेमिस्ट्री की भूमिका विषयक कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।
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बीयू कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि देश में खेती योग्य कृषि भूमि लगातार घट रही है। देश की जनसंख्या बढ़ रही है। ऐसे में लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए जैव रसायन की अहम भूमिका हो सकती है। जैव रसायन के बिना स्वास्थ्य, चिकित्सा विज्ञान, कृषि क्षेत्र में विकास संभव नहीं है। विशिष्ट अतिथि त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू के जैव रसायन विभाग के प्रमुख प्रो. एचपी पांडेय ने कहा कि जैव रसायन का अध्ययन महत्वपूर्ण हो गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में जैव भौतिकी विज्ञान की प्रो. शर्मिष्ठा डे ने भी विचार रखे। आयोजन सचिव डॉ. रमेश कुमार ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन डॉ. गुरमीत कौर त्रिपाठी, डॉ. अंकिता जैस्मिन लाल ने किया। इस दौरान प्रो. एसके कटियार, प्रो. सीबी सिंह, डॉ. रामवीर सिंह, डॉ. एसके जैन, डॉ. ऋषि सक्सेना, डॉ. संतोष पांडेय, डॉ. सर्वेंद्र सिंह, डॉ. बलवीर सिंह, डॉ. वीएस चौहान, डॉ. जोंस मैथ्यू, डॉ. सुमिरन श्रीवास्तव, डॉ. अंजली सक्सेना, डॉ. हेमंत कुमार, डॉ. आरडी कुदेशिया मौजूद रहे।

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बीटी को जानें
बैसिलस थूरिनजीनसिस (बीटी) एक एक मिट्टी में रहने वाला जीवाणु है, जो आमतौर पर जैविक कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके डीएनए के साथ फसलों के डीएनए को मिलाकर उनका उत्पादन बढ़ाया जाता है। इनके उपयोग से फसलों को कीड़े भी नहीं लगते। इस विधि से सबसे पहले टमाटर को रूपांतरित किया गया था। इस तरह के प्रयोग जानवरों पर भी किए जाते हैं।
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कैंसर का हो सकता उपचार
विशिष्ट व्याख्यानों में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में जैव भौतिकी विज्ञान की प्रो. शर्मिष्ठा डे ने कैंसर की पहचान में बायो मार्कर की भूमिका विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि बायो मार्कर के कारण स्तन कैंसर, मुख कैंसर, फेफड़ों के कैंसर की पहचान प्राथमिक स्तर पर कर उपचार किया जा सकता है। इस विधि में मरीज के रक्त में प्रोटीन के आधार कैंसर का पता लगाया जा सकता है। पेप्टिाईट आधारित औषधियों पर शोध कार्य अंतिम चरण में है। प्रो. एचपी पांडेय ने बताया कि आज चिकित्सा विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र के लिए जैव विज्ञान महत्वपूर्ण है।

जैव विज्ञान से ही होगा बीमारियों का निदान: पांडेय
जैव विज्ञान से ही सभी बीमारियों का निदान संभव है। जैव रसायन को सभी जैविक विज्ञान की मां की संज्ञा दी गई है। यह बात प्रो. एचपी पांडेय ने अमर उजाला से बातचीत में कही। उन्होंने बताया कि हमारे देश में प्रतिभाएं तो हैं, लेकिन उनका उपयोग करने के लिए संसाधनों की बहुत कमी है। विदेशों में शोध पर भारत की तुलना में कई कुना अधिक पैसा खर्च किया जाता है। जिससे उनके पास अच्छी तकनीक उपलब्ध है। स्वास्थ्य क्षेत्र में रासायनिक दवाओं के बढ़ते उपयोग के सवाल पर उन्होंने कहा कि लोगों में धैर्य की कमी है। वह दवा खाकर तुरंत दौड़ना चाहते हैं। इन दवाओं के दुष्परिणाम बहुत हैं, जो तत्काल समझ नहीं आते। आयुर्वेद से सभी बीमारियों का इलाज संभाव है, लेकिन इसका असर होने में थोड़ा समय लगता है। हमारे देश में एंटीबायोटिक दवाओं को नाश्ते की तरह खाया जाता है। लोगों की सोच कम काम कर ज्यादा लाभ पाने की बन चुकी है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू के जीव रसायन विभाग के प्रमुख प्रो. एचपी पांडेय देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों के जीव रसायन विभागों के विशेषज्ञ सदस्य के तौर पर कार्य भी करते हैं। उन्होंने यूएसए, जापान, ईरान, इथोपिया जैसे सात देशों के विश्वविद्यालय में काम किया है। उनके अब तक 200 शोधपत्र जारी हो चुके हैं। उन्होंने चिकित्सा और स्वास्थ्य से संबंधित पांच किताबें और अलग-अलग किताबें में सात अध्याय भी लिखे हैं।

भविष्य में कचरे को नष्ट करेंगे जीवाणु
भागलपुर की तिलक मांझी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. आरएस अग्रवाल ने बताया कि जैव रयासन से ऐसे जीवाणु को विकसित किया जा सकता है, जो कचरे को नष्ट करने में उपयोगी हो सकता हैं। बीटी बैगन पर उठे विवाद के बारे में उन्होंने बताया कि इसे बीटी जीवाणु के डीएनए से विकसित किया गया है। जिससे किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती। जैव विज्ञान के बदौलत ही गेहूं और चावल के ऐसी किस्में तैयार की जा चुकी हैं जो रेतीले और कम पानी वाले इलाकों में भी उग सकें।
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