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कब पड़ेगा सूखा और होगी अच्छी बरसात, रिमोट सेंसिंग लैब बताएगी सारी बात

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झांसी। अब बुंदेलखंड में 30 साल तक होने वाले भौगोलिक बदलावों का पता लग सकेगा। ऐसा रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में स्थापित होने वाली रिमोट सेंसिंग लैब की वजह से हो सकेगा। यहां पर रिमोट सेंसिंग के जरिए सेटेलाइट से डाटा डाउनलोड किया जाएगा। उसकी स्टडी कर आगामी समय में होने वाली बारिश, सूखे आदि की जानकारी मिल सकेगी।
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राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय को झांसी संभाग में वन संसाधन नियोजन एवं सतत कृषि प्रबंधन के लिए भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला की स्थापना के लिए प्रोजेक्ट मिला है। 1.42 करोड़ रुपये बजट भी आवंटित हुआ है। फॉरेस्ट बायोलॉजी एंड ट्री इंप्रूवमेंट विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार ने बताया कि लैब बनने के बाद रिमोट सेंसिंग के जरिए सेटेलाइट से डाटा डाउनलोड करेंगे। इसके जरिए आगामी समय में मौसम की भविष्यवाणी के लिए पिछले 30 साल के रिकॉर्ड का अध्ययन किया जाएगा। अधिकतम और न्यूनतम तापमान, बारिश, सूर्योदय, आर्द्रता के आधार पर आगामी 30 साल तक होने वाले भौगोलिक परिवर्तन की जानकारी दी जा सकेगी। इससे किसानों को खेती करने में काफी मदद मिलेगी। उन्हें पता चल सकेगा कि कब अच्छी बरसात होगी और कब सूखा पड़ेगा। इस हिसाब से खेतों को पानी आदि देने के संबंध में किसान फैसला कर सकेंगे।
फसल कितना देगी उत्पादन ये भी बताएंगे
लैब के जरिए क्षेत्र की मैपिंग कर ये जानकारी भी दी जा सकेगी कि कितने इलाके में जंगल है और कितने में कृषि की जा रही है। साथ ही पिछले तीन दशक में कितने इलाके में जंगल घटा है, इसका भी पता चल सकेगा। सेटेलाइट से डाटा डाउनलोड कर बता सकते हैं कि बोई गई फसल कितना उत्पादन देगी। क्षेत्र में कौन-कौन सी फसलें बोई गई हैं। साथ ही किस फसल का कितना उत्पादन मिल रहा है। किसानों को फसलों में लगे रोग की भी जानकारी दी जा सकेगी। लैब में मिट्टी की जांच भी होगी। इससे उर्वरा क्षमता, तत्व की कमी के बारे में बताया जाएगा। ये भी जानकारी देंगे कि कौन सा तत्व मिट्टी में डालने से उत्पादन बढ़ेगा।
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ऐसे चल सकेगा इन सबका पता
बताया गया कि सभी फसलों में क्लोरोफिल होता है। जितनी भी सूर्य की ऊर्जा तरंग के रूप में धरती पर टकराती है, उसको फसल/पौधे अवशोषित कर लेते हैं। कुछ तरंगों को वापस भेज देते हैं, जिसको सेटेलाइट का सेंसर पढ़ लेता है। इसकी जानकारी डिजिटल नंबर के जरिए देता है। ज्यादा अच्छी फसल होने पर पिक्सल नंबर ज्यादा होता है। जिससे साफ तस्वीर आती है। इससे पता चलता है कि फसल अच्छी होगी। वहीं, जिस फसल के पिक्सल नंबर खराब आते हैं, उससे पता चल जाता है कि इसमें कुछ समस्या है।
आरकेवीवाई के तहत इस प्रयोगशाला की स्थापना की जानी है। इसके बाद आगामी कई दशकों में होने वाले भौगोलिक बदलाव की जानकारी हो सकेगी। जबकि, सेटेलाइट से ली जाने वाली इमेज के डिजिटल नंबर के आधार पर फसलों के संबंध में भी अहम जानकारी मिलेगी। - डॉ. अरविंद कुमार, कुलपति, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय।
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