झांसी । झांसी से साठ किलोमीटर दूर मोंठ तहसील में पट्टी कुम्हर्रा गांव स्थित है। इसी गांव में एक अक्टूबर 1928 को महाकवि अवधेश का जन्म हुआ था। पिता ग्याप्रसाद श्रीवास्तव का रुझान भी साहित्य की ओर था, इस कारण अवधेश की रुचि काव्य में हो गई। हिंदी व खड़ी बोली में जहां उनकी रचनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई तो उनके वीररस के बुंदेली कविता संग्रह बुंदेलभारती, श्रमणा शबरी के राम बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी व हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर, मणिपुर तथा झांसी व सागर में कई शोध विद्यार्थी इनके साहित्य पर पीएचडी कर चुके हैं। उनकी श्रमणा शबरी के राम व बुंदेलभारती को राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इन दोनों कृतियों पर सबसे ज्यादा शोध कार्य किया गया है।
महाकवि अवधेश के पौत्र अशोक कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि उनकी कविता किसको कितना प्यार करूं काफी लोकप्रिय है, श्रृंगार रस की इस रचना में अवधेश जी ने लिखा है, सुमनों में कितनी सुंदरता मन से नहीं नजर से पूंछो, कलियों में कितनी मादकता माली नहीं भ्रमर से पूंछो। कूलों की बाहों में भी बंध सरिता कितनी इठलाती है, श्रृंगों का मद मान मंथन कर सागर में लय हो जाती है। यौवन सरिता की चंचलता तट से नहीं लहर से पूंछो।
दिखा परी काली की झांकी, झांसी वाली रानी में
साहित्यकार व बौद्ध शोध संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि अवधेश जी जितने श्रृंगार की रचनाओं में सिद्धहस्त थे, उससे कहीं अधिक उनकी वीररस की कविताएं लोकप्रिय हुई हैं। इसके अलावा ग्रामीण अंचल के किसान और खेत खलिहान के जो चित्र उन्होंने अपने काव्य में खींचे हैं वे लाजवाब हैं। वीररस की एक कविता में उन्होंने लिखा है, जब छू जाएगी चिंगारी बुंदेलखंड के पानी में, तब भड़क उठेगी क्रोध ज्वाल फिर झांसी वाली रानी में। मत समझो रानी नहीं यहां, जन-जन झांसी वासी तो हैं। झांसी वाली रानी न सही, रानी वाली झांसी तो है। इसी तरह अवधेश जी ने महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता का बखान करते हुए लिखा है, जिनके राज न सूरज डूबे नाम सुने से चौक परें, जइ झांसी फिर फांसी बन कें अंग्रेजन के परी गरैं, दिखा परी काली की झांकी, झांसी वाली रानी में। पानीदार यहां का पानी आग यहां के पानी में। कुशवाहा बताते हैं अवधेश जी जैसे कवि और उनके ग्रंथ आने वाली पीढ़ी को एक नये रास्ता दिखाएंगे इसीलिए अवधेश जी ने लिखा है, चलते हैं जिस ओर महाजन उसे पंथ कहते हैं, जिन ग्रंथों में ग्रंथी गुथी हो उसे ग्रंथ कहते हैं।
पानीदार यहां का पानी आग यहां के पानी में..
महाकवि अवधेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष देवेश श्रीवास्तव बताते हैं कि अवधेश जी की कृति बुंदेलभारती को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिले हैं। इसमें उनकी कविता, बुंदेलों की सुनो कहानी बुंदेलों की बानी में, पानीदार यहां का पानी आग यहां के पानी में। चित्रकूट में अवधपुरी के आकें सीताराम रहे, जबनों रये बुंदेलखंड में तब नो पूरन काम रहे. छोड़ दओ बुंदेलखंड तौ परे दोऊ हैरानी में । पानीदार यहां का पानी आग यहां के पानी में। इस कविता पूरे देश में सराहा गया है।