झांसी। देश के प्रमुख ऐतिहासिक शहरों में से एक झांसी है। यहां आज भी हर ओर वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की विरासत नजर आती है, जो देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती हैं। लेकिन, यहां आने वाले पर्यटकों के हाथ निराशा ही लगती है। झांसी के दुर्ग को छोड़ बाकी सभी धरोहर अनदेखी की शिकार हैं। यहां तक कि खंडहर में तब्दील हो चुकीं कुछ इमारतों के तो अब अवशेष ही शेष हैं, जो अब भी झांसी के गौरवशाली इतिहास की झलक पेश कर रहे हैं।
रानी महल: क्रांति का था केंद्र
झांसी। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा झांसी के दुर्ग पर कब्जा कर लेने के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने अपना निवास रानी महल में बनाया था। यहीं पर रानी ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का तानाबाना बुना था। रानी महल में मराठा शासनकाल की बेजोड़ स्थापत्य शैली के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं। लेकिन, देखरेख के अभाव में ये लगातार अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है। इसके अलावा रानी से जुड़ी कोई भी चीज यहां न होने की वजह से पर्यटक निराश होते हैं। बता दें कि रानी की ढाल-तलवार ग्वालियर नगर निगम में रखी हुई हैं, जिसे वापस लाने की लंबे समय से मांग हो रही है।
परकोटा: दरक गया झांसी का सुरक्षा घेरा
झांसी। झांसी का परकोटा इतिहास की अनूठी विरासत है। यह चारों ओर से पुराने शहर को घेरे हुए है। इसका निर्माण सन 1755 में मराठा सूबेदार नारोशंकर ने कराया था। आवागमन के लिए परकोटे से जुड़े बारह विशाल दरवाजे हैं। लेकिन, पुरातत्व विभाग ने परकोटे को अपने हाल पर छोड़ रखा है। इस पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। दीवार और दरवाजे लगातार दरकते जा रहे हैं। कई जगह तो ये पूरी तरह से जमींदोज हो चुका है।
रघुनाथ राव महल: मराठाओं के वैभव की थी तस्वीर
झांसी। रघुनाथ राव महल का निर्माण मराठा सूबेदार रघुनाथ राव ने 17वीं शताब्दी में कराया था। उस जमाने में ये इमारत झांसी के वैभवशाली साम्राज्य की तस्वीर हुआ करती थी। महल में एक और सेना के हाथी-घोड़ों को रखने का इंतजाम था तो दूसरी ओर सुर-संगीत की महफिलें सजा करती थीं। लेकिन, अब आलम ये है कि महल के पूरे परिसर में गंदगी की भरमार है। खंडहर हो चुकी इमारत अवैध कब्जों की चपेट में हैं। यहां तक कि महल के एक हिस्से को जमींदोज कर पूरा का पूरा मुहल्ला बसा लिया गया है।
झोकनबाग: फिरंगी सैनिकों का हुआ था संहार
झांसी। 1857 के गदर में फिरंगी सेना के सिपहसलारों को गोविंद चौराहे के पास मौत के घाट उतारा गया था। बाद में ब्रिटिश काल में यहां स्मारक बनाया गया, जिसे झोकनबाग सिमेट्री के नाम से जाना जाता है। कागजों में यह पुरातत्व विभाग की संरक्षित इमारतों में से एक है, लेकिन हकीकत में इसे देखने वाला कोई नहीं हैं। स्थिति ये है कि अतिक्रमण की वजह से यह स्मारक सड़क से नजर ही नहीं आता है। इसके अलावा गंदगी की भी यहां भरमार है। इसके जीर्णोद्धार की कई बार योजनाएं बनीं, परंतु परवान नहीं चढ़ सकीं।
403 साल का हो गया रानी का किला
झांसी। झांसी के किले का निर्माण ओरछा नरेश वीर सिंह जूदेव ने कराया था। सन 1613 में इसका निर्माण शुरू हुआ था, जो 1619 में पूरा हो गया था। बंगरा नाम की पहाड़ी पर 15 एकड़ के विस्तृत क्षेत्रफल में फैले इस किले में 22 बुर्ज हैं। जबकि, दो ओर गहरी खाई हैं। किले के भीतर पंचमहल स्थित है, जो मराठा शासनकाल में शासकों का निवास हुआ करता था। किले के भीतर प्राचीन शिव व गणेश मंदिर स्थित हैं, जो आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। किले में साल भर में दो लाख से अधिक पर्यटक पहुंचते हैं।
पानी वाली धर्मशाला: मनोरम हुआ स्थल
झांसी। शहर के बीचों बीच घनी आबादी में स्थित पानी वाली धर्मशाला (तालाब) का निर्माण चंदेलकाल में हुआ था। मराठा शासन काल में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया गया था। पिछले तीन दशक से ये जल स्रोत दुर्दशाग्रस्त बना हुआ था। पानी कीचड़ में तब्दील हो गया था और ऊपरी सतह पर जलकुंभी उग आई थी। लेकिन, अभी हाल ही में स्मार्ट सिटी के तहत इसका जीर्णोद्धार किया गया है। इससे इसकी दशा एकदम बदल गई है और शहर का ये मनोरम स्थल बन गया है।