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Jhansi News: जांच के इंतजार में सालों से बोतलों में बंद विसरा, छह महीने से अधिक समय बाद आती है रिपोर्ट

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अमर उजाला ब्यूरो



झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के बर्खास्त जेई अम्बरीश गौतम समेत करीब 150 मौत की गुत्थी विसरा रिपोर्ट न आने से उलझी है। कई साल गुजर जाने के बाद भी इनकी मौत के राज फोरेंसिक विभाग की बोतलों में बंद हैं। वर्षों से इन बोतल के ढक्कन खुलने का ही इंतजार हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन साल के दौरान 749 मामले जांच के लिए भेजे गए, लेकिन 239 की ही जांच रिपोर्ट आ सकी। सामान्य तौर पर एक विसरा रिपोर्ट आने में छह माह से भी अधिक समय लग रहा है।



पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह साफ न होने पर मृत्यु का कारण जानने के लिए विसरा (गुर्दे का कुछ हिस्सा, आंत का टुकड़ा) सुरक्षित रखा जाता है। परीक्षण के लिए इसे विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा जाता है। राजगढ़ में इसके लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त फोरेंसिक लैब बनी है। तीन साल से यह लैब काम कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों की कमी एवं संसाधन न होने से विसरा जांच नहीं हो पाती। हालात यह है कि जितने मामले हर माह निपटाते हैं, उससे करीब डेढ़ गुना नए मामले आ जाते हैं। इस वजह से लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट आने में छह माह से अधिक समय लग जाता है। एसएसपी बीबी जीटीएस मूर्ति का कहना है कि समय से विसरा जांच रिपोर्ट तैयार हो, इसके लिए तालमेल बनाकर कोशिश की जाएगी।
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इनसेट



सबसे अधिक जहर के मामले फंसे

जहर की आशंका की वजह से जिनके विसरा भेजे गए, उनकी रिपोर्ट आने में वर्षों लग जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका परीक्षण सबसे लंबा होता है। इसके लिए कई रसायनों का इस्तेमाल होता है। इस वजह से भी समय अधिक लगता है। इस समय प्रयोगशाला में 350 से अधिक मामले सिर्फ जहर के फंसे हैं। इनकी जांच रिपोर्ट अब तक नहीं आ सकी। इस वजह से यह मामले कोर्ट में अटके हुए हैं।



यह होता है विसरा



विसरा में मृतक के गुर्दे, आंत एवं आमाशय के कुछ हिस्से को नमक के संतृप्त घोल में शीशे की बोतल में सील करके रखा जाता है। इन नमूनों की मदद से मृत्यु का कारण समेत शरीर में कोई जहरीले पदार्थ या दवाओं की मौजूदगी के बारे में पता चलता है।
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इनसेट



चार्जशीट के साथ दाखिल करनी पड़ती है रसीद

विवेचक चार्जशीट के साथ पोस्टमार्टम रिपोर्ट लगा देते हैं। इसके साथ विसरा सुरक्षित की बात लिख देते हैं। विसरा रिपोर्ट न आने पर विवेचक को मजबूरन फोरेंसिक विभाग की रसीद को चार्जशीट के साथ दाखिल करना पड़ता है। जांच रिपोर्ट सालों तक कोर्ट में पेश नहीं होती। कई साल बाद रिपोर्ट आने पर कोर्ट में उसे पेश किया जाता है। कई मामलों में पुलिस की भी लापरवाही होती है। विसरा प्रयोगशाला में ही समय पर नहीं भेजा जाता है।
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