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गांव-गांव में राजनीति गरमाई, जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी निशाने पर आई

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झांसी। पंचायत चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही ग्रामीण इलाकों में राजनीति गरमा गई है। राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए हैं। खासतौर पर भाजपा और सपा के खेमे में खासी हलचल देखने को मिल रही है। हालांकि, बसपा में भी सक्रियता बढ़ी हुई है। लेकिन, जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर भाजपा और सपा आमने - सामने की स्थिति में हैं। परिस्थितियां मुफीद होने के चलते भाजपा हर हाल में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर अपना नुमाइंदा बैठाना चाहती है। जबकि, सपा कुर्सी पर कब्जा बरकरार रखने की तैयारी में है।
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जिला पंचायत अध्यक्ष पद के इतिहास में भाजपा अब तक इस सीट पर कब्जा नहीं जमा पाई है। चार बार इस सीट पर सपा और दो बार बसपा उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। 1995 में सपा ने इस सीट पर कब्जा जमाया था। जबकि, साल 2000 में बसपा अपना जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने में कामयाब हो गई थी। 2005 में एक बार फिर से वापस ये सीट सपा के खाते में आ गई थी। लेकिन, 2010 में बसपा ने सपा से ये सीट छीन ली थी। सपा ने पलटवार करते हुए 2013 में ये सीट बसपा से छीन ली थी और 2016 के चुनाव में भी अपना कब्जा बरकरार रखा। 24 सदस्यीय जिला पंचायत में सपा की स्थिति अब भी सबसे भारी है। सपा के पास 16 सदस्य हैं। जबकि, भाजपा के पांच और बसपा के तीन सदस्य हैं।
हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा ने शुरुआत से ही सपा से ये कुर्सी छीनने की तैयारी कर ली थी। इसके लिए लामबंदी तेज हो गई थी। लेकिन, स्थानीय बड़े नेताओं द्वारा दिलचस्पी न दिखाने से बात नहीं पाई। लेकिन, अब पंचायत चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही भाजपा सक्रिय हो गई है। वहीं, सपा से जिला पंचायत सदस्य की दावेदारी करने वाले भी अपने - अपने क्षेत्रों में सक्रिय बने हुए हैं।
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जमीन तैयार करने मेें जुटे भाजपाई
झांसी। ग्रामीण इलाकों में समाजवादी पार्टी का खासा दबदबा रहा है। लेकिन, आगामी पंचायत चुनाव की तैयारी में जुटे भाजपाई हवा का रुख मोड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। संभावित दावेदारों ने अपने-अपने इलाकों में तैयारी शुरू कर दी है। जिला पंचायत सदस्य के दावेदार अपने साथ क्षेत्र पंचायत और ग्राम प्रधानी के संभावित दावेदारों के साथ लामबंदी में अभी से जुट गए हैं। कुछ ऐसा नेता भी सक्रिय हैं, जिनकी पृष्ठभूमि शहरी है, लेकिन ये नेता भी जिला पंचायत तक पहुंचने के लिए अपना क्षेत्र तैयार करने में जुट गए हैं। इनके निशाने पर जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी है।
2017 में भाजपा और सपा के मंसूबे नहीं हो पाए थे पूरे
झांसी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी हथियाने के लिए रस्साकसी तेज हो गई थी। भाजपा के एक सदस्य ने इसके लिए लामबंदी शुरू कर दी थी। सपा और बसपा के कुछ सदस्यों का भरोसा भी जीत लिया था। लेकिन, एकाएक भाजपा के कुछ नेताओं का रुख बदल गया था, जिससे सारी कवायद धड़ाम हो गई थी। वहीं, सपा में भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी थी। सपा का एक खेमा अपनी ही पार्टी की जिला पंचायत अध्यक्ष को कुर्सी से बेदखल करने की तैयारी में जुट गया था। लेकिन, सपा मुखिया अखिलेश यादव के हस्तक्षेप करने की वजह से जिला पंचायत अध्यक्ष का विरोधी खेमा अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाया था।
भाजपा का ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य सभी दलों के मुुकाबले आधार ज्यादा मजबूत है। पिछले विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में ये बात साबित हो गई है। पंचायत चुनाव में भाजपा सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के साथ जनता के बीच जाएगी और पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ेगी।
- मुकेश मिश्रा, महानगर जिलाध्यक्ष - भाजपा
ग्रामीण क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी की जड़ें अब भी सबसे ज्यादा मजबूत हैं। भाजपा सरकार किसान, मजदूर के मुद्दे पर पहले ही फेल हो चुकी है। जनता सपा की ओर आशा भरी नजरों से देख रही है। ये स्थिति आगामी पंचायत चुनाव में सपा के लिए एकदम मुफीद बनी हुई है।
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- महेश कश्यप, जिलाध्यक्ष - सपा
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