झांसी। पूर्वजों की छोड़ी गई खेल विरासत को आज की पीढ़ी संजोकर नहीं रख पाई। इसका अंदाजा महानगर के पुराने स्कूलों के खेल मैदानों को देखकर लगाया जा सकता है। लंबे-चौड़े ये खेल मैदान लगातार अनदेखी के चलते ऊबड़-खाबड़ जमीन में तब्दील हो चुके हैं। हालात ये हैं कि इन मैदानों में खेलना तो दूर की बात, पैदल चलना भी दूभर हैं। संसाधनों के अभाव में खेल की धरती झांसी के लिए ध्यानचंद और रूप सिंह जैसे खिलाड़ियों को तराश पाना आसान नहीं है।
हमारी पिछली पीढ़ी खेल के प्रति कितनी संवेदनशील थी, इसका अंदाजा महानगर के पुराने स्कूलों के खेल मैदानों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। सभी विद्यालयों में जितनी जमीन पर भवन बनाए गए हैं, उससे कई गुना अधिक खेल मैदानों के लिए छोड़ी गई है। शहर के सबसे पुराने स्कूलों में से एक एसपीआई इंटर कालेज में दो स्पोर्ट्स ग्राउंड हैं। लेकिन, दोनों ही बदहाल हैं। एक मैदान में तो जमीन ही नजर नहीं आती हैं। पूरे मैदान में झाड़ियां और जंगली पौधों की भरमार है। मैदान ऊबड़-खाबड़ है और जगह-जगह मिट्टी व मलबे के ढेर नजर आते हैं। कमोबेश यही स्थिति सीपरी बाजार में स्थित दूसरे स्कूल सरस्वती इंटर कॉलेज की है। यहां भी खेल का मैदान ऊबड़-खाबड़ जमीन में तब्दील हो चुका है। जबकि, दूसरा मैदान मुकदमेबाजी में फंसा हुआ है। ये केवल एक विद्यालय की स्थिति नहीं है, बल्कि ज्यादातर विद्यालयों के खेल मैदानों का यही हाल है।
29 अगस्त को मेजर ध्यानचंद के जन्म दिवस पर पूरे देश में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाएगा। ये झांसी के लिए बड़े ही फक्र की बात है। लेकिन, इससे ज्यादा झांसी का गौरव तब बढ़ेगा, जब ध्यानचंद और उनके भाई रूप सिंह जैसे खिलाड़ी झांसी की धरती से निकलकर पूरी दुनिया में झांसी का मान बढ़ाएंगे। इसके लिए स्कूलों में खेलों को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।
खेल के लिए स्कूलों को बजट भी नहीं मिलता
झांसी। स्कूलों के केवल खेल मैदान ही दुर्दशाग्रस्त नहीं हैं, बल्कि विद्यालयों को विभाग की ओर से खेल के बजट भी जारी नहीं किया जाता है। खेल बजट के नाम पर यदा-कदा दो-पांच हजार रुपये इस मद में उपलब्ध कराए जाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर विद्यालयों के पास खेल सामग्री भी नहीं है। ऐसे में प्रतिभा को पनपने का मौका ही नहीं मिल पाता है।
फीस की रकम से चलाया जाता है काम
झांसी। सरकारी व अनुदानित विद्यालयों में प्रतिमाह बच्चों से ली जाने वाली फीस में खेल मद में भी अलग से धनराशि ली जाती है, जो प्रति बच्चा प्रतिमाह पांच रुपये होती है। ये राशि इतनी कम होती है कि ये विद्यालय खेल विकास के काम नहीं आ पाती। स्थिति ये ही कि जिला व मंडल स्तर पर होने वाली प्रतियोगिताओं में विद्यालयीय टीमों को भाग दिलाने के लिए इंट्री फीस की व्यवस्था दूसरे मदों से करनी पड़ जाती है। अक्सर ये रकम शिक्षकों को अपनी जेब से भी देनी पड़ जाती है।
खेल के लिए स्कूलों को सरकार की ओर से कोई फंड नहीं दिया जाता है। जबकि, आयोजन कराने के लिए आदेश लगातार आते रहते हैं। खेल सामग्री का बंदोबस्त तो दूर की बात सरकारी आयोजनों में शामिल होने वाले बच्चों के लिए स्वल्पाहार तक की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाता है।
- डा. मनोज मिश्रा, प्रधानाचार्य - एसपीआई इंटर कॉलेज
झांसी में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें तराशना बेहद जरूरी है। इसके लिए बुनियादी खेल सुविधाएं होना जरूरी है, जो सरकार की मदद के बगैर संभव नहीं है। लेकिन सरकार हाथ खींचे हुए हैं। ऐसे में बच्चों से मिलने वाली मामूली फीस के भरोसे खेलों का विकास बेमानी ही है।
- बलभद्र सिंह, प्रधानाचार्य - एसआईसी इंटर कालेज
सरकार की ओर से यदा-कदा ही खेल मद में धनराशि आवंटित की जाती है। इसके साथ भी तमाम शर्तें जोड़ दी जाती हैं। मसलन, जरूरत होती है किसी अन्य खेल सामग्री की और सरकार की ओर निर्देश दूसरी किसी खेल सामग्री की खरीद के निर्देश दिए जाते हैं।
- प्रदीप कुमार मौर्य, प्रधानाचार्य - राजकीय इंटर कॉलेज
झांसी के कण-कण में खेल रचा बसा है। स्कूल स्तरीय प्रतियोगिताओं में ही तमाम बच्चे ऐसा खेल प्रदर्शन कर जाते हैं, जिनकी तुलना राज्य व राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं से करनी पड़ जाती है। लेकिन, संसाधनों के अभाव में प्रतिभाएं दम तोड़ देती हैं। इसके अलावा कई अभिभावक खेल का कम पढ़ाई को ज्यादा तरजीह देते हैं।
- अजय सिंह, खेल शिक्षक - जीआईसी