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जिंदगी को खा रहा तंबाकू

Tue, 31 May 2016 02:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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tabacco - फोटो : demo pic
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पान, मसाला, तंबाकू का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। जगह-जगह यहां तक कि सिगरेट के पैकेट तक में इसका लिखा होना आम बात है। इसके बावजूद बिना किसी डर के सिगरेट के छल्ले उड़ाते और मुंह में तंबाकू दबाए सैकड़ों लोग रोजाना हमें आसपास दिख जाते हैं। झांसी और आसपास के इलाकों में कैंसर की जड़ें कितनी मजबूत हो चुकी हैं? हर साल तंबाकू के सेवन से कितने मरीज कैंसर की चपेट में आ रहे हैं और मरीजों के लिए क्या है उपचार? विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर इसको लेकर रिपोर्ट।
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झांसी। किसी न किसी जरिए से तंबाकू का सेवन करने से लोग कैंसर का शिकार हो जाते हैं। इसका कोई तय समय नहीं होता है। हर व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता पर कैंसर होने का समय निर्भर करता है। किसी को सालों बीत जाने के बाद कैंसर होता है, तो किसी को महीनों में यह बीमारी अपनी चपेट में ले लेती है। मौजूदा समय में महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में हर साल 250 मुख कैंसर के नए मरीज अपना इलाज कराने आते हैं, जिसमें पचास महिलाएं भी शामिल हैं। यह आंकड़ा तो सिर्फ मेडिकल कॉलेज आने वालों का है, न जाने कितने मरीज दूसरे शहरों में इलाज को चले जाते हैं।

हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। लगातार लोगों से तंबाकू का सेवन न करने की अपील की जाती है, इसके बाद भी तंबाकू उत्पादों के लगातार सेवन से यह धीमा जहर समाज के हर तबके को प्रभावित कर रहा है। ऐसा नहीं है कि धूम्रपान करने वाला सिर्फ खुद के लिए गड्ढा खोद रहा है, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान से इसका सेवन न करने वाले लोगों को भी खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
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तंबाकू में निकोटीन, नाइट्रोसामाइंस, बेंजोपाइरींस, आर्सेनिक, क्रोमियम आदि कैंसर पैदा करने वाले तत्व पाए जाते हैं। इसमें मौजूद निकोटीन, कैडमियम और कार्बन मोनोआक्साइड तत्व सेहत के लिए बहुत हानिप्रद हैं। तंबाकू चबाने से मुंह, गला, आमाशय, यकृत और फेफड़े के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। तंबाकू जनित रोगों में सबसे ज्यादा मामले फेफड़े और रक्त से संबंधित रोगों के हैं। जिनका इलाज न सिर्र्फ महंगा व जटिल है। धूम्रपान फेफड़े के कैंसर का एक मुख्य कारण है। धूम्रपान फेफड़े के अलावा मुख का कैंसर, ह्रदय रोग और स्ट्रोक आदि होने का भी कारण है। वहीं, पान मसाला, गुटका चबाने वालों को 15 से 20 सालों में मुख कैंसर होने की संभावना होती है। जबकि, मुख कैंसर की पूर्र्व अवस्थाएं जैसे ल्यूकोप्लेकिया, सबम्यूकसफायब्रोसिस और लाइकेन प्लेनस की शुरूआत एक दो साल में ही हो सकती है। मेडिकल कॉलेज में हर साल कैंसर के 800 से 900 मरीज आते हैं, इसमें 250 मरीज मुख कैंसर के होते हैं। खास बात यह है कि पचास महिलाएं भी मुख कैंसर से पीड़ित हर साल मिल रही हैं।

फेफड़े कैंसर के लक्षण
- लक्षण सांस लेने में दिक्कत होना
- सीने में दर्द होना, भूख न लगना
- वजन का लगातार कम होना
- कभी-कभी खांसी के साथ रक्त निकलना  

मुख कैंसर के लक्षण
- मुंह चार सेमी. से कम खुलना
- मुख में भूरे, लाल या काले चकत्ते होना
- मुख में छाला आठ से दस दिन बाद भी ठीक न होना

कैंसर रोग विशेषज्ञ से तुरंत मिलें
मुंह कम खुलना, चकत्ते हो जाने, छाला ठीक न होने पर मरीज को तुरंत कैंसर रोग विशेषज्ञ के पास जाकर जांच करवानी चाहिए। शुरूआती अवस्था में मुख कैंसर का उपचार शल्य चिकित्सा के बगैर रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी से किया जा सकता है और चेहरे को कुरूप होने से बचाया जा सकता है। वहीं, लेजर सर्जरी से मुख कैंसर की पूर्वावस्था ल्यूकोप्लेकिया को वाष्पीकृत कर पूर्णतया समाप्त किया जा सकता है। मुख कैंसर से बचाव को टमाटर में मौजूद लाइकोपिन की दवा प्रभावी पाई गई है।

भारत में मुख कैंसर के सर्वाधिक मरीज
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार हर साल तंबाकू के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों के कारण भारत में दस लाख लोग मर जाते हैं। वहीं, दुनिया में हर साल 50 लाख लोगों की मौत होती है। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि सन 2050 तक 2.2 अरब लोग तंबाकू या तंबाकू उत्पादों का सेवन कर रहे होंगे। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि पुुरुषों में 50 व स्त्रियों में 25 फीसदी कैंसर की वजह तंबाकू है। इसमें 90 फीसदी मुख कैंसर के हैं। मुख कैंसर के रोगियों की सबसे अधिक संख्या भारत में है।

मरीजों के लिए शुरू किया वाट्स एप नंबर
मेडिकल कॉलेज के कैंसर रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अंशुल गोयल ने कैंसर पीड़ित मरीजों के लिए वाट्स एप नंबर 9565693223 शुरू किया है। डॉ. अंशुल ने बताया कि इसी नंबर के जरिए वह मरीजों से हर समय जुड़े रहते हैं। उन्होंने सॉफ्टवेयर के जरिए मोबाइल में हर मरीज की डिटेल अपलोड कर ली है। जैसे ही किसी मरीज का उनके पास फोन आता है, तो मरीज की सभी डिटेल फोन पर दिख जाती हैं। इसके बाद वह मरीज को परामर्श, दवाओं की जानकारी दे देते हैं। उनकी इस पहल से दूर दराज के कैंसर मरीजों को बहुत मदद मिल रही है।

पचास करोड़ का गुटका, तंबाकू सालाना खाते हैं जनपदवासी
झांसी के निवासियों में तंबाकू और गुटका की लत कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा इनकी बिक्री से लगाया जा सकता है। कारोबारी सूत्रों के अनुसार साल भर में 24 करोड़ रुपये का गुटका झांसी में खाया जाता है। वहीं, बीड़ी, सिगरेट और सादे तंबाकू की बिक्री 26 करोड़ रुपये सालाना है। कुल मिलाकर झांसी पचास करोड़ रुपये का गुटका और तंबाकू साल भर में खा जाता है।
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