चंद्रप्रकाश मिश्रा
लोहागढ़। स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के इतिहास में झांसी जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित छोटा सा गांव लोहागढ़ अपने अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है। वर्ष 1857 के संग्राम में यहां के ग्रामीण रानी लक्ष्मीबाई की ढाल बनकर अंग्रेजी सेना के सामने खड़े हो गए थे। लाठी-डंडों और पारंपरिक हथियारों से लैस ग्रामीणों ने अंग्रेजी सेना को काफी देर तक रोके रखा, जिससे रानी को कालपी पहुंचने का रास्ता मिल गया। इस संघर्ष में लोहागढ़ के सैकड़ों ग्रामीणों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी।
वर्ष 1857 में शुरू हुए स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला झांसी तक पहुंची तो रानी लक्ष्मीबाई ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। अप्रैल 1858 में अंग्रेजी सेना ने झांसी के किले को चारों ओर से घेर लिया। अपनों की गद्दारी के कारण अंग्रेज किले में प्रवेश करने में सफल हो गए। हालात बिगड़ने पर किले के भीतर रसद पहुंचना भी बंद हो गया।
इसी बीच रानी को तात्या टोपे और बांदा के नवाब की ओर से कालपी आने का संदेश मिला। रणनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए रानी ने झांसी से निकलकर कालपी की ओर कूच करने का निर्णय लिया। वह अपनी छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ आगे बढ़ीं लेकिन जनरल ह्यूरोज की विशाल सेना लगातार उनका पीछा कर रही थी। ऐसे में रानी का सुरक्षित कालपी पहुंचना आसान नहीं था।
रास्ते में लोहागढ़ के ग्रामीण अंग्रेजी सेना के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए। उन्होंने पारंपरिक हथियारों के साथ अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया और उसे आगे बढ़ने से रोक दिया। ग्रामीणों के इस प्रतिरोध का लाभ रानी को मिला और वह सुरक्षित कालपी पहुंचने में सफल रहीं। हालांकि, ग्रामीणों के इस संघर्ष की कीमत उन्हें भारी बलिदान देकर चुकानी पड़ी। अंग्रेजी सेना ने बाद में गांव में भारी तबाही मचाई और बड़ी संख्या में ग्रामीण मारे गए। (संवाद)
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दूल्हे की शहादत के बाद दुल्हन भी कूद पड़ीं रणभूमि में
लोहागढ़ के संघर्ष से जुड़ी एक मार्मिक कहानी आज भी सुनाई जाती है। बताया जाता है कि शादी के तुरंत बाद एक दूल्हा अपनी दुल्हन को लेकर गांव पहुंचा था। इसी दौरान अंग्रेजी सेना के आने की खबर मिली। दूल्हे ने शादी का जश्न छोड़ रणभूमि का रुख किया और लड़ते हुए शहीद हो गया। पति की शहादत की खबर दुल्हन को मिली तो वह भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में कूद पड़ी। उसने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुई।
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कालपी में रानी ने फिर संगठित की सेना
इतिहासविद एवं सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. पीके अग्रवाल के अनुसार, वर्ष 1857 के संग्राम में लोहागढ़ के ग्रामीणों का योगदान अद्वितीय था। बच्चे-बुजुर्ग, महिला-पुरुष सभी रानी की ढाल बनकर अंग्रेजी सेना के सामने खड़े हो गए थे। इस संघर्ष में सैकड़ों लोगों ने बलिदान दिया। ग्रामीणों के प्रतिरोध के कारण ही रानी सुरक्षित कालपी पहुंच सकीं।
कालपी पहुंचने के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर सेना को नए सिरे से संगठित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी सेना को कड़ी चुनौती दी। आगे चलकर रानी अपने सहयोगियों के साथ ग्वालियर पहुंचीं और वहां किले पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजी सेना से संघर्ष करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में वीरगति प्राप्त की।
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विरासत का हो संरक्षण
स्थानीय निवासी यशपाल सिंह ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई के इतिहास में लोहागढ़ का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां तमाम विरासत हैं, जो 1858 में अंग्रेजों से हुए संग्राम की साक्षी हैं। लेकिन, देखरेख के अभाव में ये अपना स्वरूप खोती जा रही हैं। जबकि, इन्हें सहेजने की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ी गौरवशाली इतिहास को जान सके।