झांसी। एक जमाने में झांसी में 11 सिनेमाहाल थे पर इसमें नौ बंद हो गए। अब मात्र इलाइट और खिलौना सिनेमाहाल ही चल रहे हैं। इसमें भी अक्सर दर्शकों की संख्या कम ही रहती है। प्रदेश सरकार के ताजे फैसले के मुताबिक दोबारा सिनेमाहाल चालू करने पर 100 फीसदी तक मनोरंजन कर (अब जीएसटी) में छूट दी जा सकती है। इससे बंद सिनेमाहालों के फिर चालू होने की उम्मीद बढ़ी है।
बंद पड़े सिनेमाहालों को फिर चालू करने की सरकारी नीति का संचालकों ने स्वागत किया है पर यह भी कहा है कि मनोरंजन कर के अलावा अन्य करों में भी छूट दी जाए, तभी बात बनेगी। पिछले दस साल के दौरान नंदनी, लक्ष्मी, डमरू, नटराज, लास्कला, भूषण, चित्रा, मिनर्वा और कृष्णा सिनेमाहाल बंद हो गए। इसका बड़ा कारण इंटरनेट, फिल्मी टीवी चैनल, मोबाइल, यू ट्यूब जैसी सुविधाओं का शुरू होना है। लोग घर बैठे या जब चाहे फिल्म देख सकते हैं। साथ ही मल्टीप्लक्स के चलन ने भी सिंगल स्क्रीन पर ताला डलवा दिया। इस बीच बढ़ते टैक्स, सुविधाओं की कमी और दर्शकों की घटती संख्या की वजह से सिनेमाहॉल को चलाना मुश्किल हो गया। ज्यादातर सिनेमाहॉल जर्जर हो चुके हैं। अब मनोरंजन कर को खत्म कर जीएसटी में शामिल कर दिया गया है। सिनेमाहाल संचालकों का कहना है कि सुविधाएं और बढ़ाई जाएं, तभी बात बनेगी।
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सभी तरह के टैक्स हटाएं
सिनेमाहाल पर मनोरंजन कर के अलावा संपत्ति, सफाई, शो और विज्ञापन कर भी देना पड़ता है। बिजली के लिए भी अधिक दर पर मिलती है। सब खर्च निकालने के बाद एक टिकट पर करीब नौ रुपये बचते हैं। इतने में सिनेमा हाल का संचालन मुुश्किल है। बंद सिनेमाहॉलों को दोबारा चालू कराने की पहल अच्छी है। मगर, यह तभी संभव है, जब सिनेमा से सभी तरह के टैक्स हटा लिए जाएं।
मुकुंद मेहरोत्रा, संचालक नंदिनी सिनेमाहॉल
ऐसे वसूलते हैं मनोरंजन कर
अभी तक 40 रुपये से ऊपर तक के एक टिकट पर 40 प्रतिशत मनोरंजन कर लगता था। मगर, जीएसटी में 100 रुपये तक के टिकट पर 18 प्रतिशत और 100 से ऊपर के टिकट पर 28 प्रतिशत मनोरंजन कर का प्रावधान किया गया है। जून में खिलौना के ऑडी वन हॉल से 16,01,148, ऑडी टू हॉल से 6,33,661 और इलाइट टाकीज से 3,12,554 रुपये मनोरंजन कर जमा कराया गया।
ये है नियम
1986-87 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की सरकार ने सिनेमा उद्योग को जीवित रखने के लिए नियम बनाया था कि यदि कोई संचालक सिनेमाहाल बंद कर परिसर में कोई दूसरा कारोबार करना चाहता है तो यह संभव नहीं होगा। हां, वह सिनेमाहाल परिसर के एक हिस्से में दूसरा कारोबार कर सकता है। सिनेमाहाल तो चलाना ही पड़ेगा।
यादों के झरोखे से
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- जय संतोषी मां, शोले, नदिया के पार, क्रांति, जमाई राजा, कुली, सौतन, हम आपके हैं कौन, जैसी फिल्मों ने रिकार्ड कमाई की थी। ये फिल्में 50 हफ्तों से ज्यादा सिनेमाहॉलों में चलीं।
- इलाइट और आसपास के चार सिनेमाहॉलों में रात 12 बजे का शो जब छूटता था, तो सड़क पर लोगों का हुजूम दिखाई देता था। देर रात तक चहलपहल रहती थी।
- रात 12 बजे के बाद तांगा, ऑटो के अलावा रबड़ी, मूंगफली, नमकीन जैसी खाद्य सामग्री साइकिल पर बेचने वाले बड़ी संख्या में इलाइट के आसपास की सभी सड़कों के किनारे खड़े रहते थे।
- ब्लैक में टिकट वालों की चांदी रहती थी। इनमें पांच ऐसे टिकट ब्लैक करने वाले थे, जो उस समय लखपति बन गए थे। पुलिस पिकेट की ड्यूटी की बोली लगती थी।
- दूरदराज के ट्रेन यात्री शाम तक स्टेशन आ जाते थे। आधी रात के बाद ट्रेन का समय होने के कारण यात्री फिल्म देखकर ही समय गुजारते थे। रात के शो में ट्रेन यात्रियों की बड़ी संख्या रहती थी।
- प्रमुख सिनेमाहॉलों में हर महीने तीन लाख से अधिक टिकट बिकते थे। इसमें बड़ी संख्या ग्रामीण दर्शकों की भी रहती थी।
- छात्र नेताओं का रुतबा हुआ करता था। एक छात्र नेता रात के शो में अपने कितने साथी फ्री बैठा सकता है। इस बात से छवि का आकलन होता था।
- रात भर शहर में फिल्मों के पोस्टर चिपकाने का काम होता था। इस काम में 100 से अधिक लोग लगे हुए थे।
- नंदनी टाकीज में बच्चों के लिए सुबह 9.30 बजे से एक शो नियमित चलता था, जिसमें बाल फिल्में दिखाई जाती थी। स्कूल संचालकों ने भी एक दिन बच्चों को फिल्म दिखाने का तय कर रखा था।
- फिल्म देखने का क्रेज इस तरह लोगों में था कि शुक्रवार से मंगलवार तक अधिकांश सिनेमाहॉलों में रात के शो हाउस फुल रहते थे।
ये हैं फिल्मों के शौकीन
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सुबह 9 बजे ही लाइन में लग जाता था
मुझे फिल्म देखने का इतना शौक था कि सुबह दस बजे टिकट बुकिंग शुरू होने के एक घंटे पहले ही कतार में लग जाता था। वो दौर ही दूसरा था। अब तो टेलीविजन पर फिल्में देख लेते हैं। हॉल में जाने का मन नहीं करता।
अरविंद श्रीवास्तव।
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सुरक्षित नहीं रहा रात में निकलना
मुझे अच्छी तरह ध्यान है कि पहले रात का शो देखकर लौटने में कोई डर नहीं लगता था। लेकिन अब असुरक्षा महसूस होती है। यहीं कारण है कि रात के शो में दर्शकों की संख्या घटती जा रही है।
विजय कुशवाहा।