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Jhansi News: मधुबनी कला की जादूगर को झांसी में नहीं मिले कद्रदान

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अमर उजाला ब्यूरो

झांसी। मधुबनी (बिहार) में पली-बढ़ी सुनीला श्रीवास्तव की अंगुलियों में मधुबनी का जादू बसता है। बगैर किसी प्रशिक्षण के उनका हस्तशिल्प मन मोह लेता है। पति के आर्मी में होने के कारण कई जगह तबादले हुए मगर सुनीला का कला प्रेम बढ़ता गया। कला को कद्रदान नहीं मिले तो अचार और बरी का स्टार्टअप शुरू कर दिया। उनके साथ समूह की महिलाएं भी जुड़ी हैं लेकिन उनका दर्द है कि लंबे संघर्ष के बाद भी उन्हें प्रशासन की तरफ से कोई प्लेटफार्म नहीं मिल सका है।



सदर के भट्टा गांव की रहने वाली सुनीला बताती हैं कि पति के आर्मी में होेने के कारण बच्चों के पालन-पोषण से लेकर घर की जिम्मेदारी उनकी थी लेकिन वह मधुबनी कला को घर-घर पहुंचाना चाहती हैं। हजारों आयटम बना चुकी हैं मगर बाजार नहीं मिल पा रहा है। उनका कहना है कि मधुबनी तो हमारा रीति-रिवाज है, ऐसे में सीखना कैसा। इसके बाद, उन्होंने अपनी कला की जगह अचार और बरी का स्टार्टअप शुरू किया।
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वह बताती हैं कि वह घर पर ही मसाले पीसकर अचार तैयार करती हैं। उनके अचार और बरी की खासियत इसकी शुद्धता है। समूह की और आर्मी की महिलाएं भी उनसे जुड़ी हैं, जो रोजगार पा रही हैं लेकिन एक कलाकार होने के नाते उनका दर्द है कि उनकी कला को कद्रदान नहीं मिले, न ही कोई प्लेटफार्म ही मिल सका है। वह अधिकारियों के चक्कर काटकर थक चुकी हैं।
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कपड़ों से लेकर कलाकृतियों में मधुबनी कला के रंग बिखेरने में उन्हें महारत हासिल है। वह बताती हैं कि अब भागदौड़ नहीं होती है। ऐसे में अचार और बरी का काम ही कर रही हूं। उन्हें यकीन है कि एक दिन उनकी कला को कद्रदान जरूर मिलेगा, जब उनकी 50 हजार से ज्यादा पेंटिंग और अन्य कलात्मक वस्तुओं को खरीदार मिल सकेगा।


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