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बावड़ियां बनी कचरा घर

Fri, 22 Apr 2016 12:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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Bawdian , jhansi news - फोटो : amar ujala
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झांसी। किसी जमाने में महानगर के लोगों के लिए जीवनदायिनी जलस्रोत रहीं बावड़ियां व चौपड़ा (लघु जलाशय) अब कचरें से पट गए हैं। कभी इन जल स्रोतों के अमृत समान पानी को लोग बारहों महीने उपयोग करते थे, पर अब इनमें जल की जगह कूड़े के ढेरों ने ले ली है।    
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बड़ागांव गेट स्थित गोपाल की बगिया में दो मंजिला दलान की खूबसूरत बावड़ी संरक्षण के अभाव में कचरा के ढेर में तब्दील हो रही है। स्थानीय निवासी 80 वर्षीय गोमती के मुताबिक इस बावड़ी में वह बचपन में खूब तैरती थीं, लेकिन अब यह समुचित संरक्षण के अभाव में सूख चुकी है। कार्तिक माह व नाग पंचमी के अवसर पर बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों से हजारों लोग यहां आते थे, जिनके लिए इस बावड़ी का विशेष महत्व था।

इसी प्रकार सुनार की बगिया के सामने स्थित बावड़ी भी कचरा घर में तब्दील चुकी है। नारायण बाग में स्थित प्राचीन बावड़ियों का पानी भी काई के कारण गंदा हो गया है। कभी गर्मी के दिनों में इन बावड़ियों में ग्रीष्म ऋतु में बच्चे भारी संख्या में तैराकी सीखने को जुटते थे।
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जल स्रोतों की पहचान से बन गए मोहल्लों के नाम
महानगर में कई बावड़ी एवं चौपड़ा इतने प्रसिद्ध रहे हैं कि आज भी इनके नाम से ही उस क्षेत्र को पहचाना जाता है। फूटा चौपड़ा, नकटा चौपड़ा, श्याम चौपड़ा, पानी वाली धर्मशाला जैसे जलस्रोतों की पहचान से ही इन मोहल्लों के नाम पड़ गए हैं। कुछ चौपड़े आज लुप्त हो गए हैं और इनके सिर्फ नाम भर शेष रह गए हैं।

जहां कभी समंदर था आज बूंद- बूंद का टोटा
यह भी समय का खेल ही कहा जाएगा कि कभी बड़ागांव गेट स्थित गोपाल की बगिया क्षेत्र में स्थित लक्ष्मी तालाब समेत बावड़ियों व कुओं से जलापूर्ति के लिए महानगर के विभिन्न हिस्सों के लोग दरकार रखते थे, लेकिन आज यहां के निवासियों को पानी के लिए इधर- उधर भटकना पड़ता है।

स्थानीय निवासी धर्मेंद्र व रामस्वरूप ने बताया कि लक्ष्मी तालाब का पानी गंदा होने के कारण लोग उसे उपयोग में नहीं लेते हैं। बावड़ियों व कु ंओं के सूख जाने से लोगों को इधर-उधर के क्षेत्र में पानी लेने जाना पड़ता है। हालांकि मुहल्ले में एक हैंडपंप भी लगा है, लेकिन वह भी कभी - कभी पानी देना बंद कर देता है।  

चिह्नित स्थानों पर बनते थे जल केंद्र
पुराने युग में बावड़ियां व चौपडे़ आवागमन के रास्तों तथा संतों के आश्रमों के निकट राजाओं व व्यापारियों द्वारा  बनवाए जाते थे। अच्छा पानी मिलने पर बावड़ियों के आसपास सराय की व्यवस्था कर दी जाती थी।

समाजसेवी मुकुंद मेहरोत्रा के मुताबिक झांसी नगर प्राचीन युग से ही देश के आवागमन का मुख्य मार्ग रहा है। ऐेसे में नगर क्षेत्र एवं आसपास काफी संख्या में बावड़ियां व चौपड़ा बने हुए हैं। बरसाती पानी के संरक्षण क ी दिशा में बावड़ी में पीने के पानी के स्रोत को छोड़कर उसके आसपास छोटे -बडे़ कुंड बनाए जाते थे, इसमें बरसात का पानी संरक्षण एवं संवर्धन होता था। उनके अनुसार नारायण बाग में पांच छोटी - बड़ी बावड़ियां हैं, जिनमें से एक को ठंडी बावड़ी भी कहते हैं।

बरसाती पानी को संरक्षित करती हैं बावड़ियां
बरसाती पानी को संरक्षित करने की दिशा में बावड़ियां, कु एं व चौपड़ का विशेष स्थान है। यह बरसात के बाद भूगर्भ में जल को संरक्षित रखते हैं।  भूगर्भ जल विभाग के सीनियर जीओ फिजिस्ट वीके उपाध्याय के मुताबिक अगर जल भंडारण के यह केंद्र नष्ट हो जाएंगे तो निश्चित है कि इसके परिणाम जल संकट की दृष्टि से काफी चिंताजनक होंगे। आवश्यकता है कि सभी इन जल संरचनाओं को पुनर्जीवित एवं संरक्षण करने के लिए आगे आएं।
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