अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। तबले की थाप पर थिरकते पैर और घुंघुरुओं की खनक के साथ कथक को दर्शकों के दिल तक उतारने की कला संजय श्रीवास्तव भलीभांति जानते हैं। 59 वर्ष की उम्र में भी उनका जोश युवाओं का मात देता है। वह 35 वर्षों से शास्त्रीय संगीत, नृत्य और तबला वादन कर रहे हैं। वह इस कला को घर-घर तक पहुंचाने के लिए अभी भी प्रशिक्षण दे रहे हैं।
संजय श्रीवास्तव रेलवे में कार्यरत हैं। वह उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में में आयोजित कार्यक्रमाें में हिस्सा ले चुके हैं। विशेष प्रस्तुति पर उन्हें लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय जुनू पुरस्कार भी दिया गया था। इसके साथ ही जनपद में उन्हें लायंस क्लब, भारत विकास परिषद, रोटरी क्लब समेत तमाम संस्थाओं ने भी उनकी कला को सम्मान दिया है। अबतक वह 250 से ज्यादा युवाओं को कथक का प्रशिक्षण दे चुके हैं। वहीं, 12 से ज्यादा लोगों को गायन, तबला, हरमोनियम का भी प्रशिक्षण दिया है।
टेली फिल्म में भी किया काम
संजय श्रीवास्तव ने दूरदर्शन के अलग-अलग केंद्रों पर आने वाली टेली फिल्म में काम किया है। जिसमें केएल सहगल पर आधारित उल्फत का दीया, कितना नाजुक, भगवान कृष्ण, मजरुह सुल्तानपुरी, होली और खजुराहो पर आधारित टेली फिल्म की हैं, जिसको दर्शकों ने खूब सराहा है। इसके लिए दूरदर्शन ने उनको पुरस्कृत भी किया है।
एनजीओ के तहत किए 55 कार्यक्रम
उन्होंने झांसी के कलाकारों को जोड़ने के लिए भारतीय संगीत उत्थान संस्थान एनजीओ की स्थापना की थी। जिसके तहत 55 छोटे-बड़े कार्यक्रम भी किए थे, जिसमें झांसी और आसपास के कलाकारों को काम करने का मौका दिया था। एनजीओ का उद्देश्य कलाकाराें को काम दिलाना एवं उनकी प्रतिभाओं को निखारना था।
अपने दम पर चलाते हैं चैनल ‘तेरे दम पर’
संजय चाहते हैं कि जिन प्रतिभाओं में ज्ञान का अपार भंडार है, वह ख्याति पा सकें। उसके लिए वह यूट्यूब पर एक चैनल ‘तेरे दम पर’ चलाते हैं। जिसमें वह उन कलाकारों का साक्षात्कार लेते हैं, जिनमें एक से बढ़कर एक प्रतिभा है।
बेटी भी है कथक में पारंगत
उनकी बेटी मंजरी प्रिया श्रीवास्तव भी अपने पिता की तरह ही कथक में पारंगत हैं, उन्होंने कई राज्यों में विशेष प्रस्तुति दी हैं। वह कथक, राजस्थानी घूमर नृत्य कर चुकी हैं। भ्रमरी में उन्होंने 1600 से 2000 चक्कर लगाकार रिकॉर्ड कायम किया है।