सुकुवां-ढुकुवां बांध का निर्माण हुए 112 साल गुजर चुके हैं, लेकिन इसकी सूरत में आज तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। हर साल इसे देखने हजारों लोग यहां पहुंचते हैं। मानसून के दौरान जब यहां से तीन लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा जाता है, तब इसका नजारा देखने लायक होता है। उस दौरान रोजाना हजारों लोग यहां पहुंचते हैं। इसके अंदर बनी सुरंग से करीब पचास फीट ऊंचाई से गिरता पानी अलग ही रोमांच पैदा करता है। इतनी पुरानी संरचना होने के बावजूद यह जलाशय जस का तस है। यहां अभी भी अंग्रेजों के जमाने में लगे फाटक एवं अन्य उपकरण काम कर रहे हैं।
अधिशासी अभियंता उमेश कुमार के मुताबिक पारीछा बांध से पानी कम मिलने पर सबसे पहले 1881-82 में तत्कालीन अधिशासी अभियंता थार्नहिल ने पारीछा से करीब 112 मील ऊपर बेतवा नदी का सर्वे किया। इस रिपोर्ट के आधार पर अधिशासी अभियंता एटकिंसन ने वर्ष 1901 में बेतवा नदी के कमांड एरिया में सुकुवां-ढुकुवां बांध का प्रस्ताव बनाया। इसकी मदद से रबी की फसल को भी पानी देना तय हुआ। इसके बाद वर्ष 1905 में इसका निर्माण आरंभ हुआ। चार साल बाद 1909 में इसका निर्माण पूरा हुआ।
इसकी कुल लागत 23.98 लाख रुपये आई। अभियंताओं का कहना है कि उस वक्त के लिहाज से यह रकम अधिक थी, लेकिन सिंचाई की जरुरत को देखते हुए सरकार ने बजट में कटौती नहीं की। निर्माण के दौरान इसका कैचमेंट करीब 82440 मील था। निर्माण यहां पानी संग्रहित होता है। अभी इसे 273.71 मीटर तक भरा जाता है। पूरा भरा होने पर यहां अभी भी 57.77 मीट्रिक घन मीटर पानी स्टोर किया जाता है।