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शबीना अदीब और जोहर कानपुरी बोले: पत्थर को तराश कर हीरा बनाएं उस्ताद शायर, घट रही है शायरों की तादात

Tue, 25 Jun 2024 05:31 PM IST
आकाश दुबे अमर उजाला नेटवर्क, झांसी

सार

उन्होंने कहा कि एक वक्त था जब मुशायरे की महफिल की तहजीब के लिए शुरू में पढ़ने वाला शायर मुशायरे के अंत तक मंच पर ही बैठा रहता था। लेकिन आज के शायर मुशायरा पढ़कर तुरंत ही मंच से चले जाते हैं।
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जोहर कानपुरी और शबीना अदीब - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्य प्रदेश के श्योपुर से मुशायरा पढ़कर लौट रहे मशहूर शायर जोहर कानपुरी और शबीना अदीब सीपरी स्थित एक साड़ी के शोरूम पर कुछ देर के लिए रुके। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज के दौर में मुशायरे में आने वाले शायर दूसरे के लिखे हुए कलाम ही पढ़ते हैं। नसीहत देते हुए कहा कि उस्ताद शायर पत्थर को तराश कर हीरा बनाएं। 

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उन्होंने आगे कहा कि आज के दौरान में लगातार शायरों की तादात घटती चली जा रही है। जिसका मुख्य कारण है मुशायरे के मंच में अधिकतर शायर दूसरे के लिखे गए कलाम ही पढ़ते हैं। जिससे शायर एक दायरे तक ही सीमित रह जाता है। एक वक्त था जब मुशायरे की महफिल की तहजीब के लिए शुरू में पढ़ने वाला शायर मुशायरे के अंत तक मंच पर ही बैठा रहता था। लेकिन आज के शायर मुशायरा पढ़कर तुरंत ही मंच से चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण मुशायरों के आयोजनों में कमी तो जरूर आई है लेकिन मुशायरे बंद नहीं हुए है। मुशायरे के शौकीन आज भी काफी दूर तक मुशायरा सुनने के लिए जाते हैं।
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दूसरे वतन में लगते है हिदुस्तान जिंदाबाद के नारे
जोहर कानपुरी की पत्नी और मशहूर शायरा शबीना अदीब ने कहा कि जब दुनिया के विभिन्न देशों में मुशायरे आयोजनों में जाते हैं तो मेरी गजल पर मुझे तो वाहवाही मिलती है। इसके साथ ही हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाए जाते हैं। वह पल सबसे हसीन और खुशी का पल होता है। खमोश लब है झुकी हैं पलकें दिलों में उल्फत नई नई है। गजल को पढ़कर उन्होंने कहा कि वैसे तो कई गजलें पढ़ी हैं। लेकिन इस गजल को कई सिंगरों ने अपनी आवाज में गाया है। हालांकि उनको इसकी इजाजत लेना चाहिए था। लेकिन मैने कोई एतराज किया।
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