उन्होंने आगे कहा कि आज के दौरान में लगातार शायरों की तादात घटती चली जा रही है। जिसका मुख्य कारण है मुशायरे के मंच में अधिकतर शायर दूसरे के लिखे गए कलाम ही पढ़ते हैं। जिससे शायर एक दायरे तक ही सीमित रह जाता है। एक वक्त था जब मुशायरे की महफिल की तहजीब के लिए शुरू में पढ़ने वाला शायर मुशायरे के अंत तक मंच पर ही बैठा रहता था। लेकिन आज के शायर मुशायरा पढ़कर तुरंत ही मंच से चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण मुशायरों के आयोजनों में कमी तो जरूर आई है लेकिन मुशायरे बंद नहीं हुए है। मुशायरे के शौकीन आज भी काफी दूर तक मुशायरा सुनने के लिए जाते हैं।
दूसरे वतन में लगते है हिदुस्तान जिंदाबाद के नारे
जोहर कानपुरी की पत्नी और मशहूर शायरा शबीना अदीब ने कहा कि जब दुनिया के विभिन्न देशों में मुशायरे आयोजनों में जाते हैं तो मेरी गजल पर मुझे तो वाहवाही मिलती है। इसके साथ ही हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाए जाते हैं। वह पल सबसे हसीन और खुशी का पल होता है। खमोश लब है झुकी हैं पलकें दिलों में उल्फत नई नई है। गजल को पढ़कर उन्होंने कहा कि वैसे तो कई गजलें पढ़ी हैं। लेकिन इस गजल को कई सिंगरों ने अपनी आवाज में गाया है। हालांकि उनको इसकी इजाजत लेना चाहिए था। लेकिन मैने कोई एतराज किया।