पृथक बुंदेलखंड को आंदोलन की दरकार
1993 के टीवी बंद आंदोलन से चर्चाओं में आया था
1998 के महा आंदोलन के बाद से नहीं मिली धार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। आजादी के पूर्व अपना अस्तित्व रखने वाला बुंदेलखंड आजाद भारत में पहले सीपी व विंध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में बंट गया है। बुंदेलखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए शुरूआत में तो तमाम आंदोलन हुए, लेकिन पिछले दो दशक से कोई बड़ा आंदोलन बुंदेलखंड की सड़कों पर नहीं हुआ है।
बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई को आगे बढ़ाने की मंशा से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं।
आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व वर्तमान बुमुमो अध्यक्ष हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया था। विपक्ष के नेता अटल विहारी बाजपेई ने सरकार की खिंचाई की और मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया था। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया था, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया था। यह वह दौर था जब चारों ओर बुंदेलखंड राज्य आंदोलन की हवा गर्म थी।
वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ खुराफाती तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।
उनके निधन के बाद आंदोलन को धार नहीं मिली। रैली, सम्मेलन, हस्ताक्षर अभियान, धरना, बैठकों को दौर तो बदस्तूर जारी है, लेकिन, कोई इतना बढ़ा आंदोलन नहीं हुआ कि उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगना की तरह बुंदेलखंड अलग राज्य बन सके।
वर्जन
राजनीतिक लड़ाई लड़ेगा मोर्चा
पृथक राज्य के लिए अब बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा ने राजनीतिक लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है। चुनाव आयोग में बुमुमो पंजीकृत राजनीतिक दल है। आगामी विधानसभा चुनावों में हम अपने प्रत्याशी उतारेंगे। हमारे प्रत्याशी जब जीत कर सदन में जाएंगे तो वह ही पृथक राज्य की वकालत करेंगे।
हरीमोहन विश्वकर्मा
केंद्रीय अध्यक्ष बुमुमो
रैली में बुंदेलखंड राज्य की मांग उठाई
झांसी। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा
युवा प्रकोष्ठ के कार्यकर्ताओं ने मोटर साइकिल रैली निकाल कर बुंदेलखंड
राज्य बनाने की मांग को लेकर सदर विधायक को ज्ञापन सौंपा। युवा प्रकोष्ठ के
तत्वावधान में निकाली गई रैली का शुभारंभ डॉ. बाबूलाल तिवारी ने मोर्चा का
झंडा दिखाकर किया। रैली इलाइट चौराहे से होेती हुई सदर विधायक रवि शर्मा
के निवास पर पहुंचकर ‘घेरा डालो डेरा डालो’ कार्यक्रम के तहत लगभग दो घंटे
तक विधायक को घर पर रोके रखा। इस दौरान मोर्चा के महामंत्री रवींद्र कुरेले
ने प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन सदर विधायक को सौंपकर बुंदेलखंड राज्य
बनाने की मंाग की है। इस मौके पर कैलाश कुशवाहा, सीएल कुशवाहा, रानू यादव,
नरेंद्र कुशवाहा, नंदन कुशवाहा, राहुल यादव, जीशान शेख, रामबहादुर
त्रिपाठी, आकाश कुशवाहा, प्रमोद दुबे, रामसील खान, अमित माल, जेपी खरे आदि
उपस्थित रहे। रैली का संचालन युवा केंद्रीय उपाध्यक्ष संदीप यादव ने किया।