झांसी। रमजान का पूरा महीना ही मोमिनों के लिए अजमत, रहमत और बरकतों का महीना होता है लेकिन अल्लाह ने इस पाक महीने को तीन भागों में बांट दिया है। रमजान के दूसरे अशरे को तौबा का अशरा कहा जाता है। इस अशरे में बंदे अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा कर मगफिरत की दुआ करते हैं। आज मगरिब की नमाज के बाद से ही रमजान के दूसरे अशरे की शुरुआत होगी।
इस्लाम के मुताबिक रमजान के महीने को दस-दस दिन के तीन अशरों में बांटा गया है। पहले रोजे से दसवें रोजे तक रमजान का पहला अशरा होता है जिसको रहमत का अशरा कहा जाता है। वहीं ग्यारहवें रोजे से बीसवें रोजे तक रमजान का दूसरा अशरा होता है इस अशरे को मगफितर का अशरा कहा जाता है जिसमें रोजेदार रोजे रखकर अल्लाह से मगफिरत की दुआ मांगते हैं। आज शाम को मगरिब की नमाज के बाद से ही रमजान का दूसरा अशरे की शुरूआत हो जाएगी। दूसरा अशरा रमजान के बीसवें रोजे से तक होगा।
इस संबंध में मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि रमजान का हर दिन बड़ा ही कीमती होता है। रमजान का चांद दिखते ही शैतान को कैद कर दिया जाता है। इस पाक महीने में हर अच्छे काम का दर्जा सत्तर गुना होता है। रमजान का दूसरे अशरा मगफिरत का होता है। इस अशरे में अधिक से अधिक तौबा कर अल्लाह पाक से मगफिरत की दुआ मांगना चाहिए। अल्लाह रहीम और करीम हैं। अपने बंदों को माफी देते हैं।
रमजान में मरने वाले सीधे जन्नत में होते हैं दाखिल
झांसी। रमजान के पाक महीने की शुरुआत होते ही शैतान को कैद कर दोजख के दरवाजों को बंद कर जन्नत के दरवाजों को खोल दिया जाता है। जिसके चलते इस पाक महीने में मरने वाले लोग सीधे जन्नत में दाखिल होते है। जबकि ईद का दिन गुजरने के बाद ही अल्लाह के दरबार में उनका हिसाब किताब होता है। वहीं इस्लामिक जानकारों के अनुसार इस माह में जन्नती लोगों की ही मौत होती है।