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खुली जेल में तब्दील हो गई थी झांसी, कई की तो दीपावली भी कैद में मनी

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झांसी। राम मंदिर निर्माण के आंदोलन के दौरान एक वक्त ऐसा आया था जब झांसी नगर को खुली जेल घोषित कर दिया गया था। सन् 1990 में लाखों की संख्या में यहां गिरफ्तारियां हुईं थीं। इनमें दक्षिण के राज्यों से आए कारसेवकों के अलावा आरएसएस, भाजपा, बजरंग दल व विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय कार्यकर्ता भी शामिल थे। आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे इनमें से कई लोगों की दीपावली तक जेल में मनी थी। पांच अगस्त को जन्म भूमि पर राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन होने जा रहा है। ऐसे में आंदोलन के इन सक्रिय सदस्यों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। उनका कहना है कि आंदोलन के दौरान जो कष्ट सहे थे, उन पर अब मरहम लग रही है।
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मंदिर निर्माण के आंदोलन के दरम्यान 30 अक्तूबर 1990 को अयोध्या में मुख्य कारसेवा होनी थी। इसके लिए कारसेवक पहले से ही अयोध्या की ओर कूच करने लगे थे। ट्रेनों में कारसेवकों के जत्थे के जत्थे झांसी से गुजर रहे थे। उन्हें रोकने के लिए सरकार ने कारसेवकों को झांसी में ट्रेनों से उतारना शुरू कर दिया था। स्थिति ये थी कि 28 अक्तूबर तक झांसी में स्कूलों व अन्य स्थानों पर बनाईं गईं सभी अस्थायी जेल भर चुकी थीं। दक्षिण के राज्यों से आए दो लाख से अधिक कारसेवक यहां इकट्ठा हो गए थे। ऐसे में प्रदेश सरकार ने झांसी को खुली जेल घोषित कर दिया था और नगर की सीमाओं को कड़ा पहरा बैठा दिया था, ताकि कारसेवक नगर के बाहर न जा पाएं। हिंदूवादी संगठनों के स्थानीय कार्यकर्ता इन कार सेवकों के लिए भोजन - पानी का इंतजाम करने में जुटे थे। कोई पर्दे के पीछे से काम कर रहा था, तो कोई खुलकर मैदान में थे। स्थानीय कार्यकर्ताओं की भी धड़ाधड़ गिरफ्तारियां हो रहीं थीं। इन्हें झांसी के अलावा जालौन व ललितपुर जेल भेजा जा रहा था। तब इन कारसेवकों की दीपावली तक जेल में मनी थी। लेकिन, दशकों पहले देखा गया कारसेवकों का सपना अब पूरा होने जा रहा है। ऐसे में सभी बेहद खुश हैं।
रवींद्र शुक्ल पर लगी थी रासुका, महीनों काटी जेल
तत्कालीन नगर विधायक रवींद्र शुक्ला राम मंदिर निर्माण के आंदोलन में केंद्रीय भूमिका में रहते थे। आंदोलन के लिए भाजपा व आरएसएस की योजना बनाने वाली टीम का वे हिस्सा थे। यही वजह है कि पुलिस ने उन्हें रासुका लगाकर महोबा जेल भेज दिया था। मंदिर आंदोलन के दौरान रासुका के तहत पहली कार्रवाई शुक्ला के खिलाफ हुई थी। 1989 से लेकर 1992 तक वे झांसी में आंदोलन के अगुवा बने रहे और इस दरम्यान चार माह से अधिक समय जेल में गुजारा। पूर्व मंत्री रवींद्र शुक्ला ने बताया कि मंदिर निर्माण के भूमि पूजन की तिथि नजदीक आने के साथ ही आंदोलन का पूरा मंजर उनकी आंखों के सामने से गुजरता प्रतीत हो रहा है। करोड़ों कारसेवकों के त्याग और बलिदान की नींव पर मंदिर की दीवारें खड़ी होंगी। ये किसी सपने के सच होने जैसा है।
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पर्दे के पीछे से काम करती थी छाया समिति
मंदिर निर्माण के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने छाया समिति का गठन किया था। ये समिति पुलिस और प्रशासन की नजर में नहीं आ पाई। झांसी में छाया समिति की कमान प्रदीप सक्सेना के हाथों में थी। प्रदीप सक्सेना ने बताया कि छाया समिति मंदिर निर्माण के आंदोलन के दौरान कारसेवकों को छाया देती रही। झांसी आने वाले कारसेवकों के रुकने, भोजन - पानी की व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियां छाया समिति ही करती थी।
छापामार शैली में निकालते थे मशाल जुलूस
मंदिर निर्माण के आंदोलन की धार बनी रहे, इसके लिए तब तमाम गतिविधियां आयोजित की जाती थीं। इसी के तहत नगर में शाम को मशाल जुलूस निकाले जाते थे, जिसकी जिम्मेदारी संघ के पदाधिकारी प्रदीप सरावगी को सौंपी गई थी। प्रदीप ने बताया कि जहां हम जुलूस निकालते थे, वहां पुलिस पहले से ही गिरफ्तार के लिए पहुंच जाती थी। ऐसे में हम आपस में दूरी बनाए रखते थे और बिगुल बजते ही सब इकट्ठा होकर हाथों में मशालें लेकर निकल पड़ते थे। पुलिस मशालें छीनती थी और गिरफ्तार कर ले जाती थी। लेकिन, अगले दिन फिर जुलूस निकलता था।
नाबालिगों को भी पुलिस ने किया था गिरफ्तार
मंदिर निर्माण के आंदोलन के दौरान कारसेवकों में तमाम ऐसे भी थे, जो बालिग भी नहीं थे। इन्हीं में से एक थे संजीव दुबे, जो इंटरमीडिएट में पढ़ रहे थे और उम्र 16 साल थी। पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया था। उस समय गिरफ्तार होने वाले कारसेवकों में सबसे कम उम्र के संजीव ही थे। जेल में वे अपनी काव्य रचनाओं के जरिये अन्य कारसेवकों का मनोरंजन करते थे।
पुलिस जमकर बरसाती थी लाठियां
राम मंदिर आंदोलन के दरम्यान भाजपा नेता सुबोध गुबरेले विद्यार्थी परिषद के जिला प्रमुख थे। आंदोलन में छात्रों के दल का नेतृत्व उन्हीं के हाथों में था। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर उरई जेल भेज दिया था। सुबोध ने बताया कि कारसेवकों के साथ पुलिस का व्यवहार बर्बर रहता था। पुलिस जमकर लाठियां बरसाती थी, फिर चाहे वो पैर में लगे या सिर में। उन्हें भी पुलिस ने जमकर पीटा था।
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