कम दूध देने वाली बुंदेलखंड की गायों की नस्ल सुधारने के लिए पशुपालन विभाग उनका गर्भाधान राजस्थानी सांडों से कराएगा। क्रास ब्रीड के बाद जो बच्चा गाय जन्मेगी वह अच्छी नस्ल का होगा और अधिक दूध देकर पशुपालक की आय में इजाफा करेगा। गाय के अधिक दुधारू होने पर बुंदेलखंड में व्याप्त अन्ना प्रथा पर भी रोक लगेगी। विभाग ने इसके लिए 20 जर्सी और 10 थरपरकर सांड खरीदने का फैसला लिया है, जिन्हें न्याय पंचायतों पर रखा जाएगा।
बुंदेलखंड में व्याप्त जानवरों की अन्ना प्रथा का प्रमुख कारण इनका कम दुधारू होना है। आम तौर पर देशी गायें आधा से एक लीटर दूध ही दे पाती हैं, इस कारण पशुपालक उन्हें दोह कर छुट्टा छोड़ देते हैं, जिससे आम लोगों को परेशानी होती है। वहीं, लगातार सूखा पड़ने से परेशान किसान के पास आय बढ़ाने के लिए यह गायें मजबूत विकल्प नहीं बन पा रही हैं। किसान अब बैलों से खेती का काम नहीं करता है, इस कारण अब बछड़े उनके किसी काम के नहीं रहे। स्थिति यह है कि छुट्टा घूमने वाले बछड़े और गायें गोकशों का शिकार बनती हैं।
समस्या के समाधान के लिए अन्ना प्रथा उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत किसानों को पशुओं के छुट्टा घूमने के नुकसान बताए जा रहे हैं कि किस तरह छुट्टा सांडों के संपर्क में आने से गायों की नस्ल कमजोर होती जा रही है। गायों की नस्ल सुधारने के लिए उन्नत नस्ल के सांड के सीमन से कृत्रिम गर्भाधान काया जाने की योजना विभागीय अधिकारियों ने बनाई है। इसके लिए तीस राजस्थानी सांड खरीदे जाएंगे, जिनसे गायों का गर्भाधान कराया जाएगा।
ये है नुकसान
छुट्टा सांडों के संपर्क में आने से गायें गर्भवती हो जाती हैं। छुट्टा सांड की प्रजनन क्षमता तीन से चार साल में कम हो जाती है तथा लगातार एक ही प्रजाति के सांड़ से गर्भ धारण करने से गायों की नस्ल भी कमजोर हो जाती है। इससे गायों की आनुवांशिक गुणवत्ता कमजोर हो जाती है। अन्ना प्रथा उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत कमजोर नस्ल के बछड़ाें का बधियाकरण किया जा रहा है। ताकि, छुट्टा घूमने वाले सांड़ों से गायों की नस्ल खराब न हो।
सांडों से सुधरेगी गायों की नस्ल
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डा. योगेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि उत्तराखंड के चमोली से जर्सी नस्ल के बीस सांड़ और राजस्थान के सूरतगढ़ से थारपरकर नस्ल के दस सांड़ समेत कुल 30 सांड़ मंगाए जा रहे हैं। इस सांडों को न्याय पंचायत स्तर पर रखा जाएगा, जहां आसपास के गांवों में छुट्टा और पालतू गायों का गर्भाधान कराया जाएगा। इससे गायों की नस्ल में सुधार होगा और जो गायें आधा लीटर से दो लीटर तक दूध देती हैं, वह पांच से पंद्रह लीटर तक दूध देने लगेंगी। इससे किसान इन गायों को छुट्टा नहीं छोड़ेंगे।