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रेलवे स्टेशन पर 131 साल बाद पसरा सन्नाटा

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कोरोना के कारण झांसी रेलवे स्टेशन परिषर को वेरीकेडिंग लगा कर आम लोगों के लिए ‌बंद कर दिया गया हैं ?
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झांसी। रानी की नगरी का रेलवे स्टेशन स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई से लेकर आजादी तक का गवाह है। इसका उद्घाटन एक जनवरी वर्ष 1889 को हुआ था। इन 131 सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ कि यात्री सुविधाएं कभी पूरी तरह बंद हुई हों। मगर कोरोना वायरस के खतरे ने ऐसा करने पर मजबूर कर दिया। इन दिनों जैसा सन्नाटा कभी स्टेशन पर नहीं रहा।
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मिलिट्री सिविल प्रशासन ने जुलाई 1886 में इस स्थान का अंतिम रूप से चयन कर भूमि अधिग्रहण की थी। सबसे पहले अप और डाउन पैसेंजर प्लेटफार्म, एक प्रतीक्षालय, पहूंज बांध, अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए आवास का निर्माण हुआ। इसके बाद झांसी स्टेशन का उद्घाटन एक जनवरी 1889 को हुआ। इंडियन मिडलैंड रेलवे, जिसका मुख्यालय झांसी था। इसके द्वारा झांसी से कानपुर, ग्वालियर तक लाइन डलवाई गई। आज पूरे देश को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक जोड़ने की वजह से झांसी एक महत्वपूर्ण स्टेशन बन चुका है। शुरुआत में भाप के इंजन से इक्का-दुक्का ट्रेनें ही चलती थीं। आज यह स्टेशन देश के प्रमुख स्टेशनों में शुमार है। आज इस स्टेशन को शुरू हुए 131 साल से अधिक का वक्त बीत चुका है। इस बार भारत- पाकिस्तान, भारत- बंगलादेश, भारत- चीन का युद्ध, देश में 1974 में इमरजेंसी लगी और रामजन्म भूमि विवाद के दौरान कर्फ्यू भी लगा। मगर कभी रेलवे स्टेशन से सवारी गाड़ियों का गुजरना बंद नहीं हुआ। स्टेशन हमेशा अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाता रहा, लेकिन आज कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए झांसी रेलवे स्टेशन भी सन्नाटे में है। प्रतिदिन स्टेशन की साफ- सफाई हो रही है, लेकिन मुसाफिर कोई नहीं है।
हर साल करते हैं 84 लाख यात्री सफर
झांसी बुंदेलखंड का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। यहां से प्रतिदिन औसत 120 सवारी और 90 मालगाड़ियां गुजरती हैं। इनमें शताब्दी एक्सप्रेस, गतिमान और राजधानी एक्सप्रेस जैसी वीआईपी ट्रेनें भी शामिल हैं। यहां से प्रतिदिन 18 हजार अनारक्षित व पांच हजार आरक्षित कोचों में मुसाफिर सफर करते हैं।
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