झांसी। शहर में कई नर्सिंगहोमों, दलालों, एंबुलेंस और ऑटो चालकों के गठजोड़ से मरीजों की ‘खरीद-फरोख्त’ का खेल चल रहा है। मरीज लाने पर अस्पताल दलालों को 50 फीसदी तक और एंबुलेंस, ऑटो चालकों को पांच से 15 प्रतिशत तक कमीशन देते हैं। ऐसे में चालक बुंदेलखंड के कम पढ़े लिखे मरीजों को गुमराह कर सेटिंग वाले नर्सिंगहोमों में ले जाते हैं। फिर अस्पताल मरीजों से तरह-तरह की जांचें करवाकर और महंगी दवाएं लिखकर मनमानी ‘वसूली’ करते हैं।
जनपद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में 113 नर्सिंगहोम पंजीकृत हैं। इनमें से कुछ तो बड़े और पुराने अस्पताल हैं, जहां प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या अच्छी खासी रहती है। वहीं, कई नर्सिंगहोमों को मरीजों के लाले पड़े रहते हैं। इनके लिए स्टाफ, बिजली, पानी आदि का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे नर्सिंगहोमों ने अपनी कमाई के लिए एंबुलेंस, ऑटो चालकों के साथ गठजोड़ कर लिया है। बुंदेलखंड समेत आसपास के जनपदों के लिए झांसी, ग्वालियर चिकित्सा का केंद्र हैं।
झांसी में इलाज कराने के लिए निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, महोबा, बांदा, हमीरपुर आदि जनपदों से आने वाले मरीज बसों से रिसाला चुंगी पर उतरते हैं। यहीं से शुरू हो जाता है ऑटो चालकों का खेल। बसों से उतरने वाले यात्रियों से ऑटो चालक कहां जाना है पूछते हैं। मरीज जैसे ही किसी अस्पताल का नाम लेता है तो चालक उसे गुमराह करना शुरू कर देता है। वह सेटिंग वाले अस्पताल में मरीज को ले जाता है। इसका चालक को पांच से लेकर 15 फीसदी तक कमीशन मिलता है। यही हाल, निजी एंबुलेंस का है। निजी एंबुलेंस चालकों ने तो ग्वालियर तक के कई अस्पतालों से भी सेटिंग कर रखी है।
इसके अलावा दलाल बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, मेडिकल कॉलेज के आसपास घूमते रहते हैं। कोई भी भटकता हुआ मरीज दिखता है, तो उसका हाल चाल पूछने के बाद अपनी बातों में फंसाकर सेटिंग वाले अस्पताल ले जाते हैं। इसके लिए दलाल को 50 फीसदी तक कमीशन दिया जाता है। झांसी में यह मकड़जाल बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। कभी भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
केस-1
नगरा निवासी मोनू खान ने बताया कि कुछ दिन पहले भाई का इलाज कराने के लिए वह उसे महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज ले जा रहे थे। ऑटो चालक से जब उन्होंने मेडिकल कॉलेज चलने को कहा तो पहले उसने मर्ज पूछा। जब उन्होंने बीमारी बताई तो चालक कहने लगा कि मेडिकल कॉलेज में अच्छा इलाज नहीं होता है। एक निजी अस्पताल का नाम बताते हुए कहा कि वहां चलोगे तो मरीज ठीक हो जाएगा। उसकी बातों में आकर वह भाई को लेकर निजी अस्पताल चले गए। वहां 80-90 हजार रुपये खर्च भी हो गए। हालत में सुधार न होने पर बाद में मरीज को मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया। कुछ दिनों बाद भाई की मौत हो गई।
केस-2
आवास विकास निवासी शंकर पटैरिया ने बताया कि अपने रिश्तेदार की तबीयत बिगड़ने पर उसे मेडिकल कॉलेज ले जा रहे थे। ऑटो चालक अच्छा इलाज कराने की बात कहकर एक निजी अस्पताल ले गया। चालक ने यह भी कहा कि वह कम पैसे में अस्पताल में इलाज करवाएगा। उस अस्पताल के डॉक्टर विदेश से पढ़ाई करके आए हैं। झांसी में उनके मुकाबले कोई भी डॉक्टर नहीं है। अस्पताल में आधुनिक मशीनें भी हैं। यह सुनकर वह भ्रमित हो गए। अस्पताल में भर्ती होने के तुरंत बाद ही हजारों रुपये प्रतिदिन खर्च होने शुरू हो गए। जब 48 हजार रुपये खर्च हो गए और सेहत भी नहीं सुधरी तो मरीज को मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया। अब वह ठीक है।
केस-3
रिसाला चुंगी पर तैनात पीआरडी जवान संजय रायकवार ने बताया कि निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, महोबा, बांदा, हमीरपुर आदि जनपदों से मरीज चुंगी पर बसों से उतरते हैं। यहीं से ऑटो से वह मेडिकल कॉलेज या निजी अस्पताल जाते हैं। बसों से उतरते ही ऑटो चालक और दलाल मरीजों को अपने जाल में फंसाने लगते हैं। प्रतिदिन वह छह से सात मरीज को दलालों और ऑटो चालकों के चंगुल में फंसने से बचाते हैं। मरीजों को समझाते भी हैं कि मेडिकल कॉलेज जाकर या फिर जिस अस्पताल की सोचकर आए हो वहीं जाकर इलाज कराओ। दलालों और ऑटो चालकों को डांट डपटकर भगाते भी हैं।
मेडिकल स्टोर, क्लीनिक खोल कर रहे गुमराह
नामचीन डॉक्टर के नाम पर कई लोग मेडिकल स्टोर और क्लीनिक खोल कर मरीजों को गुमराह कर रहे हैं। नामचीन डॉक्टर जिस मर्ज का इलाज करता है, उसके उपनाम का इस्तेमाल कर दवाएं बांटते हैं। जबकि, संचालक तो क्या कोई स्टाफ का सदस्य भी उस उपनाम का नहीं होता है।
जो लोग दलालों, ऑटो व एंबुलेंस चालकों से गठजोड़ करके इस पेशे को बदनाम कर रहे हैं, उनको चिह्नित किया जाएगा। इसके बाद कमेटी की बैठक बुलाकर इस प्रकरण पर चर्चा की जाएगी। कमेटी जो भी फैसला लेगी उसी अनुसार कार्रवाई की जाएगी। - डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार, आईएमए अध्यक्ष।
यदि कोई मरीज दलाल, ऑटो या एंबुलेंस चालक द्वारा जबरदस्ती किसी नर्सिंगहोम में ले जाने की शिकायत करता है, तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में कोई भी शिकायत हो तो मरीज सीधे आकर मुझसे मिले। - डॉ. जीके निगम, मुख्य चिकित्सा अधिकारी।