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स्मार्ट सिटी में शामिल होेगा परकोटा

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nagar nigam jhansi - फोटो : demo
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झांसी। आखिरकार अमर उजाला की परकोटे को सहेजने की मुहिम रंग लाई। शनिवार को नगर निगम की सदन की बैठक में यह मुद्दा जोरशोर से उठाया गया। इस पर जिलाधिकारी/ नगर आयुक्त ने कहा कि स्मार्ट सिटी में परकोटे को शामिल कराकर संवारा जाएगा।
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 सदन की बैठक में पार्षद सुलेमान मंसूरी ने दरकते परकोटे को सहेजने का मामला उठाया। इसका अन्य पार्षदों ने भी समर्थन किया। मौजूद पार्षदों ने बताया कि ऐतिहासिक धरोहर परकोटे को सहेजने की जिम्मेदारी एक भी विभाग नहीं ले रहा है। यही कारण है कि अवैध कब्जे के साथ ही कई स्थानों पर देखरेख न होने के कारण उनका अस्तित्व खत्म होने लगा है।
बैठक में मौजूद पुरातत्व अधिकारी डॉ. वीके दुबे ने बताया कि परकोटे को सहेजने की जिम्मेदारी उनके विभाग के अधीन नहीं है। इस पर जिलाधिकारी शिवसहाय अवस्थी ने तत्काल परकोटे को सहेजने के लिए उन्हें स्मार्ट सिटी योजना में शामिल करने का आदेश दिया। अभी तक ऐतिहासिक दरवाजों को ही उनके पुराने स्वरूप में लौटाने के लिए स्मार्ट सिटी योजना में शामिल किया गया था, जबकि, खिड़की और परकोटे अपेक्षित थे। अब जाकर परकोटे को भी उनके पुराने स्वरूप में लौटाने का काम होगा।
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झांसी की पहचान है परकोटा
1857 की गदर में फिरंगी सेना के सामने यह परकोटा झांसी की जनता की ढाल बनकर खड़ा था लेकिन, अब अपने ही इसे ढहा रहे हैं। दरअसल, परकोटे के संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार के किसी विभाग ने नहीं ली थी। केंद्रीय पुरातत्व विभाग को किले के संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है लेकिन किले के इस हिस्से को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। राज्य पुरातत्व विभाग का भी इससे कोई सरोकार नहीं है। शहर में विकास का काम करने वाले सरकारी विभाग नगर निगम और झांसी विकास प्राधिकरण भी इसकी जिम्मेदारी से कन्नी काटे थे। इसी का नतीजा है कि परकोटे का स्वरूप लगातार खुर्द-बुर्द होता जा रहा है। जगह-जगह इस पर कब्जा कर मकान बना लिए गए हैं। वहीं, कुछ स्थानों पर ये देखरेख के अभाव में ध्वस्त भी हो चुका है।


अंग्रेजों के समय की अजेय दीवार है परकोटा
झांसी राज्य की स्थापना के साथ ही मराठाओं ने सन् 1796 से 1814 के मध्य लगभग 7.3 किलोमीटर की परिधि में नगर परकोटा और उसके  गेटों का निर्माण कराया था। इसका श्रेय सूबेदार नारो शंकर और सूबेदार शिव राम भाऊ को जाता है। नगर दीवार लगभग पांच से छह फीट चौड़ी है। इस पर कभी सैनिक खडे़ होकर चौकसी करते थे और छोटी तोपें भी इधर-उधर ले जाई जाती थीं। अंग्रेजों के समय में इस दीवार को अजेय माना जाता था। यही वजह है कि दीवार न तोड़ पाने पर अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई के एक प्रमुख मराठा सरदार को लालच दिया और ओरछा गेट के दरवाजे खुलवा दिए थे, जिसके बाद युद्ध का परिणाम अंग्रेजों के पक्ष में चला गया था। समय और आबादी बढ़ने के साथ ही परकोटों के अस्तित्व पर संकट खड़ा होने लगा और आज आलम ये है कि चंद किलोमीटर का हिस्सा ही सुरक्षित रह गया है।


अमर उजाला की लहराईं प्रतियां
अमर उजाला ने भांडेरी गेट के पास नगर निगम के जिम्मेदारों  द्वारा ही परकोटों को ढहाने का मामला प्रकाशित करने के साथ ही अभियान चलाकर ऐतिहासिक विरासत को बचाने की मुहिम चलाई थी। ‘अंग्रेज नहीं कर सके, नगर निगम ने ढहा दिया झांसी का परकोटा!’,  ‘विरासत को ही किया जा रहा नष्ट’, ‘दरकता रहा परकोटा, आंखें मूंदे रहे ‘जिम्मेदार’, ‘जिम्मेदार’ ही बने परकोटे के दुश्मन’ शीर्षक से कई खबरें प्रकाशित कीं गईं, जिसकी प्रतियां सदन की बैठक में लहराईं गईं, जिसे नगर आयुक्त, महापौर ने संज्ञान में लिया।
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