झांसी। यदि आपका बच्चा अनाप-शनाप खर्च कर रहा है तो थोड़ा सावधान हो जाएं। बच्चे अपने पिता के ई-वॉलेट व एटीएम से रुपये निकालकर कर पार्टियां व महंगी खरीदारी कर रहे हैं। पापा समझ रहे हैं कि उनके खाते से रुपये निकल गए। साइबर थाना पुलिस से शिकायत के बाद की गई जांच में बच्चों की पोल खुली है। घर का ही मामला निकलने के बाद अब परिजन कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं।
थाना नवाबाद क्षेत्र निवासी एक कारोबारी के ई-वॉलेट से अचानक 32 हजार रुपये निकल गए। रकम निकलती देख कारोबारी घबरा गया। तत्काल उन्होंने साइबर थाना पहुंचकर पूरी घटना की जानकारी दी। साइबर थाना पुलिस की पड़ताल में पता चला कि किसी करीबी ने ही रकम निकाली है। पूरी तरह जांच करने के बाद उनके बेटे की करतूत सामने आई। सामने बुलाकर जानकारी करने पर बच्चा सहम गया। उसने बताया कि रुपये निकालकर दोस्तों के साथ पार्टी की और खरीदारी भी कर ली। बेटे का नाम सामने आने के बाद पिता भी खामोश हो गए। ऐसे कई लोग सामने आए हैं, जिनके बच्चों ने ही पिता के ई-वॉलेट व मोबाइल से ऑनलाइन शॉपिंग कर पेंमेंट कर दिया। अभिभावक समझते रहे कि वह साइबर क्राइम का शिकार हो गए हैं।
दो माह में आए 17 मामले
पुलिस के पास दो माह में इस तरह के करीब 17 मामले सामने आए हैं। शिकायत आने के बाद पुलिस जांच के दौरान चकरघिन्नी बनी रही। सभी मामलों की जांच में बच्चों की करतूत सामने आने के बाद पुलिस के साथ-साथ परिजन भी हैरान हैं। लेकिन, कार्रवाई कराने के नाम पर सभी पीछे हट गए।
केस नंबर 1
महंगा मोबाइल खरीदा
एक बच्चे ने पिता के मोबाइल से ऑनलाइन शॉपिंग कर 28 हजार रुपये का मोबाइल खरीद लिया। साइबर थाना पुलिस से की गई शिकायत के बाद सच सामने आया।
केस नंबर 2
जूते व कपड़े मंगाए
एक बच्चे ने भी ऑनलाइन शॉपिंग से जूते व कपडे़ मंगा लिए। खाते से रकम निकलने के बाद पिता को लगा कि साइबर अपराधियों ने ही खरीदारी की है।
केस नंबर 3
होटल में मनाया बर्थडे
एक बच्चे ने पापा के खाते से रुपये निकालकर अपना बर्थडे होटल में दोस्तों के साथ मनाया। यहां भी साइबर सेल से शिकायत के बाद पोल खुली।
इसका ध्यान जरुर रखें
- मोबाइल का पासवर्ड अपने बच्चों को बता देते हैं, जबकि ऑनलाइन ट्रांजेक्शन की सबसे पहली कड़ी मोबाइल ही है।
- क्रेडिट या डेबिड कार्ड के आगे के नंबर या पीछे के सीवीवी नंबर से ऑनलाइन शॉपिंग सहित अन्य ट्रांजेक्शन होते हैं।
- लोगों के पास 2 या उससे ज्यादा मोबाइल नंबर होते हैं, लेकिन एटीएम, आधार कार्ड, ऑनलाइन खरीदी सहित अन्य ट्रांजेक्शन के लिए अपना प्राइमरी मोबाइल नंबर ही देते हैं। ऐसे में उस नंबर की सिम को अलग मोबाइल में रखें और वह लॉक होने के साथ आपके पास हमेशा रहे।
अभिभावक भी थोड़ा सतर्क रहें। इस तरह के तमाम मामले साइबर थाने में आ रहे हैं। घरवालों की नजरअंदाजी का फायदा बच्चों को मिल रहा है। क्योंकि, अमूमन बच्चे माता-पिता का मोबाइल इंटरनेट सर्फिं ग या गेम के लिए मांग लेते हैं। इसके बाद वह क्या करते हैं और क्या किया, इसका ध्यान कोई नहीं देता।
विवेक त्रिपाठी, एसपी सिटी, नोडल अधिकारी-साइबर थाना