झांसी। मां-बाप का प्यार बच्चे ताउम्र नहीं भूलते। कहीं-कहीं नई पीढ़ी भले ही इस प्यार को दरकिनार कर अपने ही सपनों में जी रही है, लेकिन मां-बाप की अहमियत क्या है, ये उनसे पूछिए जिन्होंने कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान अपने पापा को ऑक्सीजन पर सांसें भरते देखा। मां को हंसकर आंसू छिपाते देखा। ये बच्चे कह रहे हैं कि उन्हें अक्सर कोविड बैच के स्टूडेंट बुलाया जाता है लेकिन उन्होंने पढ़ाई से इतर दो साल घर के भीतर रहकर जो सीखा, वह कभी भूल नहीं पाएंगे। उन्होंने जाना कि जब काम धंधा सब कुछ बंद था, तब पापा ने स्कूल की फीस कैसे जुटाई, बीमार होने पर मां ने कैसे उनका ख्याल रखा। बच्चों ने कहा कि संकट में ऑनलाइन पढ़ाई तो किताबी थी, ऑफलाइन जिंदगी कैसे चलती है ये मां-बाप से ही सीखा है।
पांच दिन में मां-बाप दोनों को लील गया कोरोना, हम रह गए अकेले
झांसी। दतिया गेट बाहर रहने वाले विनीत कुशवाहा और उनकी छोटी बहन नंदिनी ने अप्रैल 2021 में पांच दिन के भीतर कोरोना के चलते अपने पापा राजू कुशवाहा और मां मीरा कुशवाहा दोनों को खो दिया। 12वीं के छात्र विनीत ने बताया कि अब वह और बहन अकेले बचे हैं। पापा एक ज्वैलरी की दुकान पर साफ-सफाई का काम करते थे। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल भी दिलाया था। मां को एक-दो दिन बुखार आया। 25 अप्रैल 2021 को अस्पताल ले गए पर रास्ते में ही मौत हो गई। पापा की तबीयत बिगड़ी तो 29 अप्रैल को अस्पताल ले गए, पर किसी ने एडमिट नहीं किया और उनकी भी मौत हो गई। ऑफलाइन जिंदगी कैसे चलती है ये मां-पापा सिखा गए।
पापा ऑक्सीजन पर थे, मां घर और हॉस्पिटल दौड़ रही थी
झांसी। झारखड़िया मोहल्ले की रहने वाली आयुषी श्रीवास्तव बताती हैं कि अप्रैल 2021 में कोरोना काल में उनके पापा दिलीप श्रीवास्तव की मौत हुई थी। इसी साल मैंने 9वीं और बड़ी बहन शुभि ने 12वीं पास की थी। पापा रेलवे में थे। एक दिन पापा को अटैक पड़ा और मां अलका ने उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया। पहले पापा की सारी रिपोर्ट निगेटिव थी, लेकिन बाद में पॉजिटिव रिपोर्ट आई, तब तक उनकी सांसें थम चुकी थीं। घर में मैं, बहन शुभि और मां ही थी। ऑनलाइन क्लास चल रही थीं, दोनों बहनें एक तरफ पापा को ऑक्सीजन पर सांसें भरते देखते थे, दूसरी तरफ पढ़ाई। वहीं मां का ये हाल कि घर-गृहस्थी, हॉस्पिटल सब उन्हें अकेले ही संभालना था। शुभि ने इसी साल आईआईटी मेन पास कर लिया है।
पापा चले गए, कोविड बैच को जीवन भर भूल नहीं पाऊंगी
झांसी। आईटीआई क्षेत्र में रहने वाली सृष्टि अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। सृष्टि बताती है कि प्रॉपर्टी डीलर पापा प्रदीप द्विवेदी चाहते थे कि मैं खूब पढ़ाई करूं। कोरोना आया तो कक्षाएं ऑनलाइन हो गईं। मैं पूरी लगन से पढ़ाई करती थी। एक दिन पापा कोरोना पॉजिटिव हो गए और मई 2021 को उनकी मौत हो गई। मां पल्लवी बेसुध हो गईं। तभी मेरा 7वीं का रिजल्ट आया था। बहुत अच्छे नंबर आए, लेकिन किसे बताती, घर में सभी थे पर पापा नहीं थे। छोटी सी उम्र में समझ नहीं आ रहा था कि मां के आंसू कैसे रोकूं। मैंने पापा की सांसे टूटती देखीं हैं, कई लोग हमें कोविड बैच के स्टूडेंट बुलाते हैं, पर घर पर रहकर ऑफलाइन जो देखा और सीखा वो नहीं भूलेगा।
कोरोना हुआ तो मम्मी-पापा ने नया जीवन दिया
झांसी। सिद्धेश्वर नगर में रहने वाले अक्षत बताते हैं कि उनका संयुक्त परिवार है। पापा अशोक द्विवेदी का बिजनेस है। मां प्रीती द्विवेदी गृहिणी हैं। कोरोना काल के वर्ष 2020 मैं 10वीं कक्षा में था। घर में दादी सूरती देवी को कोरोना हुआ। इसके बाद उसे भी कोरोना हो गया तो घर के सारे लोग परेशान हो गए। तब लगा कि जीवन में माता-पिता और परिवार की अहमियत क्या होती है। कोरोना काल में पापा का बिजनेस ठप हो गया। लेकिन मम्मी-पापा ने नया जीवन दिया। वह समय मैं जिंदगी में कभी भूल नहीं सकता। कोरोना काल ने हम बच्चों को कोविड बैच के स्टूडेंट बना दिया लेकिन इस काल ने हमें बहुत कुछ सिखाया।