देश के आम बजट पर टकटकी लगाए बैठे बुंदेलों के हाथ निराशा लगी है। बजट में सरकार की ओर से बुंदेलखंड की बदहाली का दाग धोने की दिशा में अलग से कोई प्रावधान न किए जाने से क्षेत्रीय लोग निराश हैं।
उनका कहना है कि वित्त मंत्री ने इस पिछड़े इलाके को देश के विकसित इलाकों के नजरिये से ही देखा है। जबकि, यहां की जरूरतें देश के अन्य हिस्सों से अलग हैं। इसे ध्यान में रखते हुए बजट में बुंदेलखंड को विशेष पैकेज दिया जाना चाहिए था।
बुंदेलखंड का ऐसा कोई भी गांव नहीं है, जहां तमाम घरों में ताले लटके नजर नहीं आते हों, ये वे घर हैं, जिनमें रहने वाले अपनी मिट्टी को छोड़कर रोजगार की खातिर देश के महानगरों में पलायन कर चुके हैं। ये तो त्रासदी की सिर्फ बानगी भर है।
आए दिन कर्ज में डूबे बुंदेलखंड के किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आते रहते हैं। दैवी आपदा का शिकार क्षेत्र का किसान पानी को तरस रहा है। हर खेत की सिंचाई की आस बजट पूरी नहीं कर पाया है।
ग्रामीण ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के शहरी युवा भी रोजगार के लिए लगातार महानगरों की ओर कूच कर रहे हैं। देश के आम बजट से उम्मीद थी कि सरकार यहां बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए विशेष कदम उठाएगी, लेकिन उम्मीद परवान नहीं चढ़ पाई।
क्षेत्र का औद्योगिक सन्नाटा दूर करने की दिशा में भी बजट में कोई खास घोषणा नहीं की गई, जिससे बेरोजगारों के हाथ निराशा लगी है। अपार संभावनाएं होने के बाद भी अब तक बुंदेलखंड पर्यटन का केंद्र नहीं बन पाया है।
पर्यटन विकास के मामले में भी वित्त मंत्री ने बुंदेलखंड को अलग से कुछ न देकर निराश किया है। बजट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार ने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की आवाज भी अनसुनी कर दी है।