सारस का कुनबा नहीं बचा सका वन विभाग
झांसी। संरक्षण की व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं होने से राजकीय पक्षी सारस का कुनबा पूरी तरह से विलुप्त हो गया है। वन विभाग द्वारा की गई गणना के अनुसार जिले में एक भी सारस नहीं मिला है। जानकारों का कहना है कि पहले बुंदेलखंड में राजकीय पक्षी काफी संख्या में थे लेकिन अब नजर नहीं आते हैं।
सारस को राजकीय पक्षी का दर्जा प्राप्त है। सारस को क्षेत्र की स्वस्थ परिस्थिति का संकेतक माना जाता है। सरकार द्वारा भी सारस को बचाने के लिए मुहिम चलाई गई थी, लेकिन सरकारी आदेशों पर अमल नहीं होने के कारण जिले से सारस पूरी तरह से विलुप्त हो गया है। वन विभाग द्वारा कराई गई गणना के अनुसार पिछले साल और इस वर्ष जिले में एक भी सारस नहीं मिला है। जिसके चलते अब यह माना जा रहा है कि जिले में सारसों का कुनबा पूरी तरह से खत्म हो गया है।
इस संबंध में जिला वनाधिकारी वीके मिश्रा ने बताया कि जिले में सारसों की गणना के लिए सातों रेंजों में रेंजरों की अगुवाई में सात टीमों का गठन किया गया था। इन रेंजों में एक भी सारस नहीं मिला है। सारस को बचाने की योजना के तहत राज्य पक्षी की संख्या को बढ़ाया जाएगा।
नर और मादा साथ में पाए जाते हैं
सारस पक्षी को वैज्ञानिक नाम ग्रस एंटिगोन है। यह सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है। देश भर में सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश में ही है। यह पक्षी हमेशा से ही जोड़े में रहता है। यह पक्षी नदियों, तालाबों, झीलों व शांत जगहों पर पाया जाता है।
खनन और कब्जों से विलुप्त हो गया जानकारों के अनुसार सारसों की संख्या कम होने के पीछे तालाबों पर कब्जे के साथ ही नदियों में खनन है। कब्जे व खनन होने के कारण सरसों बसेरा खत्म होता जा रहा है। जिससे चलते सारस दूसरी जगहों पर चले गए हैं।