झांसी। केंद्र सरकार की तरफ से नई शिक्षा नीति को मंजूरी देने के फैसले का शिक्षा जगत के विशेषज्ञों ने दिल खोलकर स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई नीति में काफी अच्छे विकल्प मिल जाने की वजह से उच्च शिक्षा के प्रति छात्र-छात्राओं का रुझान बढ़ेगा। इसके अलावा रोजगार और स्वरोजगार के विकल्पों में भी इजाफा होगा।
35 साल बाद लंबी कवायद कर नई शिक्षा नीति तैयार की गई है। इसे तैयार करने की पहल मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में शुरू हो गई थी। काफी सोच-विचार बनी नीति को अब मंजूरी दे दी गई है। नीति को लेकर अमर उजाला ने शिक्षा जगत के विशेषज्ञों की राय ली। सभी ने एक सुर में सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। कहा कि यह बदलाव की जरूरत तो लंबे समय से जताई जा रही थी। केंद्र सरकार ने नई नीति लागू कर शिक्षा क्षेत्र में अमूलचूल परिवर्तन लाने की शुरूआत कर दी है।
नई शिक्षा नीति में पढ़ाई छूट जाने के बावजूद फिर से शुरू करने की सुविधा छात्रों को देना अच्छा कदम है। अब शिक्षण में उम्र की बाध्यता भी नहीं रहेगी। वहीं, विद्यार्थियों को अपने पसंदीदा विषय को पढ़ने का विकल्प भी मिलेगा, चाहें वह किसी भी स्ट्रीम का हो। बजट में इजाफा होने की बात भी काफी अच्छी है। नई नीति में रटने के बजाए विषय को समझने पर ज्यादा जोर दिया है। - प्रो. जेवी वैशम्पायन, कुलपति, बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी।
काफी लंबे समय के बाद नई शिक्षा नीति लागू हुई है। अब छात्र भी सेल्फ इवेल्युएशन कर सकेंगे। किसी कारण से छात्र की पढ़ाई बीच में ही छूट गई तो उसका साल बर्बाद नहीं होगा। पढ़ाई के आधार पर सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री मिल सकेगी। इसके अलावा वह किसी स्ट्रीम से बंधकर नहीं रहेगा। अपनी इच्छानुसार पसंदीदा विषयों का चयन कर भी पढ़ाई कर सकता है। - प्रो. अरविंद कुमार, कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय।
शिक्षा नीति में बहुत सालों से बदलाव की जरूरत थी। मौजूदा समय में लागू शिक्षा नीति बहुत पुरानी बनी थी। अब जमाना काफी बदल गया है। एमबीबीएस में तो पिछले साल ही बदलाव की झलक दिखाई दे गई थी। जब मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस छात्रों को इंडियन मेडिकल ग्रेजुएट कहलाने पर मंजूरी दी गई। वहीं, पाठ्यक्रम में भी बदलाव हुआ। - डॉ. संजया शर्मा, डीन एकेडमिक, मेडिकल कॉलेज।
नई शिक्षा नीति में कौशल पर काफी जोर दिया गया है। इसके अलावा पढ़ाई ऐसी हो, जिसमें छात्र कुछ नया सीखे, इस पर भी फोकस किया गया है। कौशल का विकास होने से स्वरोजगार की संभावनाएं काफी बढ़ जाएंगी। इसके अलावा इंजीनियरिंग समेत अन्य कोर्सों की देश भर में एक जैसी किताबें चलने से सभी राज्यों के छात्रों को समान ज्ञान मिलेगा। - प्रो. वीके त्यागी, निदेशक, बीआईईटी।