हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद अपने अंतिम दिनों में आर्थिक तंगी से परेशान थे। वह अक्सर कहते थे कि हॉकी को उन्होंने बहुत कुछ दिया, पर उन्हें कुछ नहीं मिला। यह कहना है उनके पुत्र पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद का।
अशोक बताते हैं कि दद्दा इतने नाराज रहते थे कि परिवार के सदस्यों को हॉकी नहीं खेलने देते थे। वह घर में पीछे के दरवाजे से हॉकी खेलने जाते थे। 29 अगस्त 1905 में इलाहाबाद में जन्मे मेजर ध्यानचंद ने बचपन में ही हॉकी थाम ली थी। जल्द ही हॉकी में विशेषज्ञता हासिल करने पर उन्हें पंजाब रेजीमेंट में जगह मिली। यहां उनके खेल में निखार आया और वह न्यूजीलैंड जाने वाली आर्मी हॉकी टीम का हिस्सा बने।
न्यूजीलैंड में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद 1928 में उन्हें एस्टरडम ओलंपिक के लिए चुना गया, जिसके बाद वह भारतीय टीम के प्रमुख सदस्य बन गए। 1936 में बर्लिन ओलंपिक में भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वर्ण जीता। उनके खेल कौशल का जर्मन तानाशाह हिटलर मुरीद था। समूची दुनिया उनकी हॉकी खेल तकनीक की कायल थी।
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