जिले में स्कूली वाहन मानकों और नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। स्कूली वाहनों के नाम पर ज्यादातर ऑटो ही इस्तेमाल हो रहे हैं। पांच की जगह 15 बच्चों तक को बैठा लेते हैं। वाहनों की फिटनेस भी तय समय पर चेक नहीं की जाती। जाहिर है कि ऐसे स्कूली वाहन बच्चों के लिए कभी भी खतरा बन सकते हैं। सवाल है कि एटा में सड़क हादसे के दौरान 12 बच्चों की मौत के बाद क्या झांसी का प्रशासन चेतेगा?
जिले में दो सौ से अधिक निजी स्कूल हैं। इनमें बच्चों को लाने और ले जाने के लिए एक हजार से अधिक ऑटो और 20 से अधिक बसें इस्तेमाल की जा रही हैं।
ज्यादातर स्कूली वाहन मानक और नियमों की परवाह नहीं करते। एक ऑटो में 12 से 15 बच्चों तक को बैठा लिया जाता है। ऑटो वाले नियमविरुद्ध एक अतिरिक्त सीट लगवा लेते हैं और फिर बच्चों को इसमें बैठना मुश्किल होता है। ऑटो सड़कों पर तेज गति से दौड़ते हैं और अक्सर तेज आवाज में गाने भी बजाते हैं। नियमानुसार बच्चों को लाने और घर पहुंचने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे वाहनों पर स्कूली वाहन लिखना अनिवार्य है। समय-समय पर इनकी फिटनेस चेक करना जरूरी है पर ऐसा नहीं होता। इसकी चिंता न तो आरटीओ, न ही जिला प्रशासन और न ही पुलिस प्रशासन को है। अभिभावक भी कभी शिकायत नहीं करते। वे इसे मजबूरी बताते हैं।
ये हैं मानक
- स्कूली बस का रंग पीला होना चाहिये।
- आगे और पीछे स्कूली वाहन लिखा होना जरूरी है।
- वाहन में फस्ट एड बॉक्स (चिकित्सा उपकरण) जरूरी है।
- खिड़कियों में जाली और अग्निशमन यंत्र रखना जरूरी है।
- बसों में स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर लिखा होना चाहिए।
- वाहन चालक को पांच साल वाहन चलाने का अनुभव हो।
- वाहनों का इस्तेमाल सिर्फ बच्चों को लाने और पहुंचाने में हो।
- स्कूली वाहनों में जीपीएस सिस्टम होना जरूरी है।
आज से चलेगा अभियान
मानक और नियमों के खिलाफ चल रहे स्कूली वाहनों पर कार्रवाई की जाएगी। चालन किए जाएंगे। सीज भी किए जा सकते हैं। शुक्रवार से तीन दिन तक लगातार अभियान चलाया जाएगा। यह भी जांच की जाएगी कि वाहनों की फिटनेस नियमानुसार करवाई जा रही है या नहीं।
संजय सिंह, आरटीओ