झांसी। महानगर में 50 से ज्यादा कॉल गर्ल एड्स का शिकार हैं। इनके संपर्क में आकर कई लोग इस लाइलाज बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। मजदूर वर्ग से लेकर कॉलेज में पढ़ने वाले कई छात्र-छात्राएं भी एड्स पीड़ित हैं। साथ ही, इस साल जेल में चार-पांच कैदियों में भी इस बीमारी की पुष्टि हुई है।
जनपद में कई जगह देह व्यापार का धंधा हो रहा है। कई लोग देह व्यापार के अड्डे पर जाकर तो कई फोन पर कॉल गर्ल को बुलाकर यौन संबंध बनाते हैं। लोगों को इस बात की जानकारी भी नहीं है कि इनमें से कई कॉल गर्ल एड्स का शिकार हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को देखें तो महानगर में 50 से ज्यादा कॉल गर्ल एड्स पीड़ित हैं। इनके संपर्क में आकर असुरक्षित यौन संबंध बनाने वाले व्यक्ति को भी यह लाइलाज बीमारी अपनी चपेट में ले रही है। एड्स पीड़ित कई सेक्स वर्कर बीमारी की पुष्टि होने के बाद या तो इलाज नहीं कराते हैं या अधूरा छोड़ देते हैं। कुछ सेक्स वर्कर तो दूसरे जिलों और राज्यों में चले गए हैं। इसलिए बड़े स्तर पर यह बीमारी दूसरों में फैलने का खतरा है।
खास बात ये है कि ज्यादातर ट्रक चालक, मजदूर वर्ग के लोगों में यह बीमारी फैली हुई है मगर पढ़े-लिखे वर्ग के लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। कॉलेजों में पढ़ने वाले कई छात्र-छात्राएं भी इसकी चपेट में हैं। इसके अलावा नौकरी पेशा लोग भी एड्स पीड़ित हैं। जेल के कैदी भी इसका शिकार हैं। जेल में हर शनिवार जांच शिविर लगता है, जिसमें कैदियों की एड्स की भी जांच की जाती है। इस साल चार-पांच कैदियों में एड्स की पुष्टि हो चुकी है।
मेडिकल कॉलेज में एआरटी सेंटर की स्थापना वर्ष 2009 में हुई थी। अब तक सेंटर में 2022 एड्स पीड़ितों का पंजीकरण हो चुका है। इनमें से 1659 मरीजों की दवा चली। 881 मरीज अभी जीवित हैं। एआरटी सेंटर में हर साल लगभग 180 नए एड्स रोगी पंजीकृत हो रहे हैं। इनमें झांसी के अलावा अन्य जनपदों व राज्यों के मरीज भी हैं।
एड्स के मरीजों के आधार पर कुछ रेड जोन चिह्नित किए गए हैं। इसमें ब्रह्मपुरी कॉलोनी, बिजौली, मऊरानीपुर के कुछ इलाके, सीपरी बाजार, रक्सा आदि क्षेत्र शामिल हैं।
एड्स पीड़ित एआरटी सेंटर पर पंजीकरण कराने के बाद नियमित दवा का कोर्स करता रहे तो अपनी पूरी जिंदगी जी सकता है। एआरटी सेंटर पर 2009 में पंजीकृत पहला मरीज अभी भी सामान्य जीवन जी रहा है। सेंटर पर पंजीकरण के बाद मरीज की एक हरी किताब और सफेद कार्ड बन जाता है। दवाओं से मरीज ठीक तो नहीं होता लेकिन वाइरस का असर कम हो जाता है।
एड्स पीड़ित कई मरीज झाड़-फूंक के चक्कर में दवाएं छोड़ दे रहे हैं। मरीज का फालोअप करने में यह बात भी सामने आई है। कई अनपढ़ लोग इस बीमारी को ऊपरी चक्कर मान लेते हैं। इसके बाद तंत्र-मंत्र या फिर देसी दवाओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। कई मरीजों की इस वजह से मौत भी हो चुकी है।
यदि कोई व्यक्ति एड्स पीड़ित के साथ असुरक्षित यौन संबंध बना लेता है और बाद में उसे इसकी जानकारी हो जाती है तो 48 घंटे के भीतर पीईपी दवा लेकर इस बीमारी की चपेट में आने से बचा जा सकता है। मेडिकल कॉलेज में यह दवा मिलती है। इसे 48 घंटे के अंदर या जितना जल्दी हो सके खा लेना चाहिए।
पिछले तीन साल के आंकड़े
वर्ष नए मरीज दवा चली मृत चले गए
2017-18 182 174 10 36
2018-19 184 164 21 12
मार्च से अब तक 144 135 10 12
ऐसे फैलता है
- दूषित रक्त से।
- संक्रमित सुई के उपयोग से।
- पीड़ित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाने से।
- एड्स संक्रमित मां से उसके होने वाली संतान को।
वर्जन..
एआरटी सेंटर में वर्ष 2009 से अब तक 2022 मरीज पंजीकृत हो चुके हैं। इसमें 1659 की दवा चली। अभी 881 जिंदा हैं। मजदूर वर्ग के अलावा पढ़े-लिखे युवा, कॉलेज के छात्र-छात्राएं, नौकरीपेशा लोग भी इस बीमारी की चपेट में हैं। जेल के कैदी और कई सेक्स वर्करों को भी एड्स है। इस बीमारी के प्रति लोगों को बेहद सावधान रहने की जरूरत है। यदि कोई इस बीमारी की चपेट में आ गया है तो एआरटी सेंटर से नियमित दवा लेकर अपनी पूरी जिंदगी जी सकता है। - डॉ. रामबाबू, प्रभारी, एआरटी सेंटर।