फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चांद दरवाजे से जब-जब होता है ईद के चांद का दीदार

विज्ञापन
नई बस्ती में बना रधुनाथराव महल का हिस्सा। अमर उजाला
विज्ञापन
झांसी। महानगर के आशिक चौराहे से नईबस्ती को जोड़ने वाली सड़क पर जीर्णशीर्ण हालत में एक प्राचीन दरवाजा स्थित है, इसे लोग चांद दरवाजा कहते हैं। इस भव्य दरवाजे क ी छत पर जाने के लिए बनाई गईं सीढ़ियों के अब सिर्फ निशान बाकी हैं। अठारहवीं सदी में बना यह दरवाजा महज ईंट और गारे से बनी इमारत नहीं है, यह गवाह है झांसी के मराठा राजघराने के राजकुमार रघुनाथ राव और नृत्यांगना आफताब बेगम के सात्विक प्रेम की। मजहब व खास और आम की दीवार तोड़कर हमसफर बनने की कसम लेने वाले इस प्रेमी युगल की प्रेमगाथा आज भी बुंदेलखंड के चौपालों पर सुनाई जाती है। चांद दरवाजा रघुनाथराव ने अपनी प्रेमिका आफताब के लिए ईद के चांद का दीदार करने के लिए बनवाया था। इसके ऊपर छत पर जाकर आफताब ईद का चांद देखा करती थीं। आज भी चांद दरवाजे से जब-जब ईद के चांद का दीदार होता है, झांसी के लोगों को बरबस ही रघुनाथ और आफताब की प्रेम कहानी याद आ जाती है।
विज्ञापन

बात है अठारहवीं सदी की झांसी के मराठा शासक शिवराव भाऊ अपने ज्येष्ठ पुत्र कृष्णराव का युवा अवस्था में देहांत होने के बाद संन्यास लेकर बनारस चले गए थे। इसके बाद उनके पुत्र रघुनाथ राव और गंगाधर राव को गद्दी न सौंपकर अंग्रेज अफसरों ने स्वर्गीय कृष्णराव के पुत्र रामचंद्र राव को गद्दी सौंप दी। तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बेन्टिक ने रामचंद्र राव की झांसी के महाराजा के रूप में घोषणा कर दी। इसके लिए किले के अंदर एक विशाल समारोह का आयोजन किया गया। इसमें रामचंद्र राव के चाचा रघुनाथ राव और गंगाधर राव भी मौजूद थे। संगीत की स्वर लहरियों के बीच नृत्यांगनाएं अपना कला कौशल दिखा रहीं थीं। जुही बाई, मोतीबाई और काशी बाई आईं और सबसे बाद में आईं आफताब बेगम । आफताब के नृत्य से अधिक उसके रूप लावण्य पर रघुनाथ राव मुग्ध हो गए।
समारोह समाप्त होने के बाद हरकारे को भेजकर आफताब को रघुनाथराव ने नौकाविहार के लिए लक्ष्मी तालाब पर बुलवाया और यही पर हमसफर बनाने का फैसला ले लिया। एक तो अलग मजहब उस पर एक नृत्य करने वाली को झांसी का राजघराना भला अपने कुनबे में कैसे स्वीकार कर सकता था। आफताब ने रघुनाथ राव को बहुत समझाया कि नृत्यांगनाएं समाज के उस वर्ग से हैं जिसे समाज सहज स्वीकार नहीं करता है, फिर आप तो झांसी के महाराजा के चाचा हैं, पर रघुनाथराव की जिद के सामने किसी की न चली। आफताब का झांसी के किले में प्रवेश वर्जित था, इस कारण वह कुछ दिनों तक अपनी रिश्तेदार गजराबाई के यहां रहीं। 1835 में रामचंद्रराव की मृत्यु हो गई तथा रघुनाथराव तीन वर्ष के लिए झांसी के महाराजा बना दिए गए और इसी दौरान इन्होंने आफताब बेगम के लिए एक अलग से महल का निर्माण करवा दिया, जो कि चांद दरवाजे से कुछ ही दूरी पर स्थित है। नये महल में गृह प्रवेश के साथ ही आफताब ने एक बेटे को भी जन्म दिया था, इस दोहरी खुशी के मौके पर महल में जलसे का आयोजन किया गया।
विज्ञापन

बेटे का नाम रखा गया अलीबहादुर । तीन वर्ष बाद ही रघुनाथ राव का देहांत हो गया। झांसी के नये राजा के रूप में जानकी बाई, सखू बाई, गंगाधर राव के साथ ही रघुनाथ और आफताब का बेटा अलीबहादुर भी महाराजा बनने की दौड़ में शामिल था पर अंग्रेज अफसर गर्वनर जनरल आकलैंड ने अली बहादुर को वैध पत्नी की संतान न मानते हुए सत्ता से अलग कर दिया। झांसी की बागडोर गंगाधर राव को सौंपी गई। आफताब पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इस दुनिया से रुखसत होते हुए उन्होंने अपने बेटे अली बहादुर को समझाया बेटा राजघराने के लोग माने या न माने पर तुम रघुनाथ राव के चश्मोचिराग हो, रक्त संबंधों को कभी नकारा नहीं जा सकता। इसलिए हमेशा झांसी राजघराने के प्रति वफादार रहना। आफताब शून्य में समाकर अपने रघुनाथ के पास चली गई, पर अली बहादुर की आंखों में प्रतिशोध था, वह वारिस होकर भी झांसी की गद्दी नहीं पा सका और उसने अपनी मां के समर्पण और त्याग को अनदेखा कर 1857 के युद्ध में महारानी लक्ष्मी बाई के खिलाफ अंग्रेजों का साथ देकर आफताब के सात्विक प्रेम की तपस्या को खंड खंड कर डाला।
आफताब बेगम और रघुनाथराव की प्रेमकहानी पर बुंदेलखंड के प्रसिद्ध इतिहासकार स्व.डा. महेंद्र वर्मा ने काफी काम किया है, उन्होंने इस पर एक किताब भी लिखी है। इस प्रेमी युगल के प्रणय गाथा को आज भी बुंदेलखंड के बुजुर्ग बड़े चाव से सुनाते हैं। - हरगोविंद कुशवाहा, इतिहासकार
युवा पीढ़ी इस प्रेम कहानी से शायद ही वाकिफ हो पर आज से करीब पच्चीस वर्ष पहले दिल्ली के एक प्रकाशन ने मेरे पिता और प्रसिद्ध इतिहासकार डा. महेंद्र वर्मा की इसी प्रेमगाथा को लेकर एक पुस्तक भी प्रकाशित की थी।
विज्ञापन

कमलेश कुमार झांसी
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें