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मुस्लिम महिलाएं बोली, जीने का अधिकार मिला

Wed, 23 Aug 2017 12:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूराो
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court jhansi news - फोटो : demo pic
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झांसी।
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मंगलवार को तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला देते हुए उसे असंवैधानिक बताया। कोर्ट ने माना कि इससे मुस्लिम महिलाओं के  अधिकारों का हनन होता हैं। फैसले के बाद मुस्लिम समाज की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आईं। अमर उजाला से बातचीत में मुस्लिम महिलाओं ने खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि अब उन्हें जीने का अधिकार मिलेगा। हर समय पति द्वारा छोड़ने का डर नहीं रहेगा।

कोर्ट का फैसला है बहुत अच्छा
तीन तलाक महिलाओं की आजादी छीनता था। इसके प्रयोग से पति द्वारा छोड़ने का डर हमेशा रहता था, जो अब नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत अच्छा है। महिलाओं के अधिकारों के बारे में सोचा है। अब कानून बने कि मुस्लिम लड़की को अपने परिवार में बराबर का संपत्ति में अधिकार मिले।
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साजिया खान, अध्यक्ष वुमंस पॉवर ऑफ बुंदेलखंड  

सभी को बराबर का अधिकार है
इस्लाम के कानून के हिसाब से लोगों को चलना चाहिए। इस्लाम में सभी को बराबर का अधिकार है। तीन तलाक को कोई जगह नहीं है। निकाह क ी तरह तलाक के समय में गवाह की जरूरत होती है।
हाजरा रब, कमांडर गुलाबी गैंग

महिलाओं का शोषण रुकेगा
तीन तलाक के  मुद्दे को धार्मिक रूप से न देखा जाए। 80 प्रतिशत तलाक गुस्सा, आवेग और झगडे़ में हो जाते हैं। इससे पति, पत्नी और उनके बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ता है। एक बार में तीन तलाक गलत है और इसका हम विरोध करते हैं। तीन तलाक के अमान्य होने से पति-पत्नी को समय मिलेगा। महिलाओें का शोषण रुकेगा।
डा. शीराज खान, प्रवक्ता राजकीय महिला कॉलेज  
 
तलाक तभी, जब दो गवाह हों
 कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह सोच समझकर दिया। बहुत सी बच्चियों की जिंदगियां महफूज हो गई हैं। शिया समाज में तलाक तभी होता है, जब दो गवाह हों। इसके बाद पति पत्नी को तीन माह का समय दिया जाता है। ताकि दोनों पक्ष सोच समझ ले। इसके बाद तलाक होता हैं।
मौलाना सैय्यद शाने हैदर जैदी मौलाना शिया जामा मस्जिद

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड क ी राय का इंतजार
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद की कोर्ट के आदेश पर कोई राय नहीं आई हैं। ऐसे में कुछ भी कहना मुनासिब नहीं हैं। इनकी राय का सभी को इंतजार है। लेकिन हम हुकुमत से पूरी उम्मीद करते है कि मुल्क मेें तलाक पर मजहब के मुताबिक कानून लाए, जो किसी को ठेस न पहुंचाए।
मुफ्ती साबिर कासमी
 
तीन तलाक प्रथा बंद हो
कोर्ट द्वारा तीन तलाक को मना करना सही कदम है, लेकिन शरीयत के खिलाफ कुछ न हो। शरीयत ने कभी भी तीन बार में तलाक कह देने पर तलाक हो जाने की हिमायत नहीं की है। कोर्ट किसी के मजहब में दखलंदाजी न करें। हालांकि मुस्लिमों में तीन तलाक कह देने की प्रथा बंद हो जानी चाहिए।
डा. सैयद शुजात हैदर

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इस्लाम अपने आप में मुकम्मल
इस्लाम अपने आप में पूरी तरह से मुकम्मल धर्म है। तीन तलाक के मामले में कुछ भी कहने से पहले इस्लाम को पूरी तरह से जानने की जरूरत है। इस्लाम की सही जानकारी न होने के कारण औरतों पर अत्याचार होते हैं। इसके लिए केवल मर्दों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, औरतें भी जिम्मेदार होती हैं।
- डा. शाइस्ता खान, चिकित्सक

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मुस्लिम महिलाओं की है जीत
तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तहेदिल से इस्तकबाल है। इस फैसले का श्रेय किसी राजनीतिक दल को नहीं लेना चाहिए। यह पीड़ित महिलाओं की जीत है। इस फैसले के लिए सायरा बानो, अतिया साबरी और उन हर खातून को सलाम, जो इस बुराई के खिलाफ डटकर खड़ी रहीं।
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- सैयर शहंशाह हैदर आब्दी, समाजवादी चिंतक  

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फैसले के साथ हैं हम
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक के मुद्दे पर दिए गए फैसले से मुस्लिमों में बढ़ा बदलाव आएगा। मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए आने वाले दिनों में यह फैसला मील का पत्थर साबित हो गया। मुस्लिम समाज का बढ़ा तबका इस फैसले के साथ है। खासतौर पर प्रगतिशील मुस्लिम इससे बेहद खुश हैं।
- डा. कादिर खान, अध्यक्ष - अखिल भारतीय मुस्लिम महासभा
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