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मेजर ध्यानचंद्र ने ठुकरा दिया था हिटलर का प्रस्ताव

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झांसी। 1936 के ओलंपिक का फाइनल मुकाबला देखने जर्मनी का तानाशाह शासन हिटलर भी पहुंचा था। मेजर ध्यानचंद के करिश्माई खेल से वो इस कदर प्रभावित हुआ था कि उसने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वे जर्मनी में सेना में शामिल हो जाएं। हिटलर ने ध्यानचंद को सेना में ऊंचे ओहदे का प्रलोभन भी दिया था। लेकिन, उन्होंने उसे ठुकरा दिया था। ध्यानचंद ने कहा कि वे देश के लिए खेलते हैं, न कि पैसा और ओहदे के लिए।
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खेल क्षेत्र में भारत रत्न देने की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही सबसे पहला नाम मेजर ध्यानचंद का उछलकर सामने आया था। 2011 में तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री ने उनका नाम भारत रत्न के लिए प्रस्तावित किया था। इसके बाद 2012 में पूर्व क्रिकेटर विशन सिंह बेदी की अगुवाई में देश के तमाम खिलाड़ियों ने प्रधानमंत्री से मिलकर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग की थी। तत्कालीन खेल मंत्री ने उनका नाम प्रस्तावित भी किया था। लेकिन, नतीजा सिफर ही रहा। 2017 में एक बार फिर उनका नाम खेल मंत्री की ओर से भारत रत्न के लिए भेजा गया, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई पहल होती नजर नहीं आ रही है। इस दरम्यान सौ से अधिक सांसदों ने भी ध्यानचंद को खेल रत्न देने की सिफारिश की थी। लेकिन, सरकार इसे भी नजरअंदाज करती आ रही है।
झांसी। अमर उजाला और खेल विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की पुण्यतिथि पर मंगलवार को ध्यानचंद स्टेडियम के एस्ट्रोटर्फ पर हॉकी प्रतियोगिता होगी। इसमें अंडर 15 आयु बालक वर्ग की टीमें प्रतिभाग करेगी। मैच सुबह 11 बजे से होंगे। प्रभारी क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी सुरेश बोनकर ने बताया कि प्रतियोगिता लीग के आधार पर आयोजित कराई जाएगी।
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ध्यानचंद के नाम 400 अंतर्राष्ट्रीय गोलों का रिकॉर्ड है। जबकि, कुल मिलाकर उनके नाम एक हजार गोल हैं।
ध्यानचंद के पिता ठाकुर सोमेश्वर दत्त सिंह प्रयागराज के रहने वाले थे। वे सेना में थे और स्थानांतरित होकर झांसी आए थे। उनके साथ ध्यानचंद भी यहां आए थे। इसके बाद से वे यहीं के होकर रह गए। सेना और अंतर्राष्ट्रीय खेल से अलग होने के बाद ध्यानचंद सीपरी बाजार स्थित हीरोज फील्ड में नवोदित खिलाड़ियों को हॉकी की बारीकियां सिखाते थे। बाद में उनका अंतिम संस्कार भी इसी मैदान में हुआ था। मेजर की समाधि भी इसी मैदान में है।
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