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झांसी में सस्ती दवाओं की दुकानों पर लग रहे ताले

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मेडिकल दवाएं - फोटो : ?????? ?????
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झांसी। जिले में सस्ती दवाओं की दुकानों पर ताले लग गए हैं। जन औषधि केंद्रों पर खर्च न निकल पाने के कारण एक तिहाई संचालकों ने अपने लाइसेंस औषधि प्रशासन विभाग में सरेंडर कर दिए हैं। कुछ और भी बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। केंद्र संचालक इसके पीछे का कारण डॉक्टरों द्वारा दवाएं न लिखना बता रहे हैं। कुल मिलाकर केंद्र सरकार का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट परवान नहीं चढ़ पाया है।
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आम आदमी को सस्ता इलाज उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय जन औषधि परियोजना शुरू की। इसके तहत जन औषधि केंद्र खोलने के लिए लाइसेंस दिए गए। यहां पर जेनरिक दवाएं बेहद सस्ते दामों पर मिलनी शुरू हो गईं। जिले में नौ लोगों ने लाइसेंस लेने के बाद जेनरिक दुकानें भी खोल लीं। मगर डॉक्टरों ने जेनरिक के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिखना ही जारी रखा। इससे जन औषधि केंद्रों का खर्चा तक नहीं निकल सका। धीरे-धीरे करके वीरांगना नगर, मेडिकल कॉलेज के सामने और सीपरी बाजार में खुले जन औषधि केंद्र बंद हो गए। अब जो केंद्र खुले भी हैं, उनमें से कुछ और बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं।
कंपनी की मुहर लगी नहीं कि कई गुना बढ़ी कीमत
मर्ज के हिसाब से दवाइयों का सॉल्ट तैयार किया जाता है। जेनरिक दवाइयों में इस्तेमाल में लाया जाने वाला सॉल्ट लगभग एक जैसा ही होता है। इसके बाद कंपनियों द्वारा उस सॉल्ट की खरीदकर थोड़ी तब्दीली के बाद अपनी मुहर लगा दी जाती है। फिर सॉल्ट की कीमत में काफी बढ़ोत्तरी हो जाती है। इसके बाद एक्साइज ड्यूटी आदि लगने के बाद वह दवा कई गुना महंगी हो जाती है।
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ब्रांडेंड 15 करोड़, जेनरिक दवाएं 50 लाख की बिकतीं
झांसी में करीब 70-80 दवा कंपनियों के स्टॉपेज हैं। यह सभी बड़ी कंपनियां हैं, जो बड़ी मात्रा में विभिन्न मर्जों की दवाएं बेच रही हैं। ये कंपनियां कर्मचारियों द्वारा डॉक्टरों, मेडिकल स्टोरों से सेटिंग कर महंगी दवाएं बिकवा रही हैं। इसी वजह से जिले के बाशिंदे एक महीने में 15.5 करोड़ से अधिक की दवा खा रहे हैं। इसमें जेनरिक दवाओं का हिस्सा मात्र 50 लाख है। सस्ती होने के बावजूद मरीज इनका लाभ नहीं उठा पा रहे।
झांसी में जन औषधि केंद्र का लाइसेंस लेने के बाद नौ लोगों ने दुकानें खोली थीं। मौजूदा समय में छह केंद्र संचालित हैं। जबकि, सीपरी बाजार, वीरांगना नगर और मेडिकल कॉलेज के सामने स्थित निजी अस्पताल में खुले एक-एक जन औषधि केंद्र संचालकों ने अपना लाइसेंस सरेंडर कर दिया है।
- उमेश भारती, औषधि निरीक्षक, औषधि प्रशासन विभाग।
डॉक्टर मरीजों को जेनरिक दवाएं लिखने के पक्ष में नहीं हैं। जबकि, खुद खाते हैं। कई डॉक्टर अपने कंपाउंडर को भेजकर मेरे यहां से ही दवाएं मंगवाते हैं। जब मरीज खरीदने आता है तो उसे ब्रांडेड और लोकल का तुलनात्मक अध्ययन समझाना शुरू कर देते हैं। कहते हैं कि अगर कोई ब्रांडेड वस्तु महंगी होती है तो उसकी खासियत अलग होती है। इससे मरीज भ्रमित हो जाता है और जेनरिक दवाएं खरीदने नहीं आता।
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- दिवाकर त्रिपाठी, जन औषधि केंद्र संचालक।
दरों में 50 से 90 फीसदी तक का अंतर
उपचार दवाओं का नाम एक पत्ता जेनरिक मूल्य बाजार मूल्य
मधुमेह ग्रिवलिंक्लामाइड मेटफॉरमिन 10 80
प्रोस्टेट टैमसुलोसिन ड्यूटा स्ट्राइड 24 450
एलर्जी सेट्रिजीन 4 22 से 25
बीपी टेल्मिसर्टन 40 एमजी 10 70 से 80
गेस्ट्रो पैंटोप्राजोल डीएसआर 20 80 से 90
कोलेस्ट्रॉल एटोरवास्टेटिन 6 40
एंटी फंगल क्रीम 26 150
कफ सिरप टर्ब्युटेलीन 24 100
डाइफेनहाइड्रैम 13 70 से 80
एंटीबायोटिक सिप्रोफ्लोक्सासिन 17 50 से 60
सेफुरॉक्सिम 56 350
आई ड्रॉप मोक्सीफ्लोक्सासिन 12 250
वायरल पेरासिटामोल 5 18 से 20
खुजली इट्राकोनाजोल 20 138
एंटी फंगल शैंपू कीटोकोनाजोल 52 250
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