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तेजी से पांव पसार रहा एमडीआर टीबी

Wed, 02 Sep 2015 11:23 PM IST
झांसी/ ब्यूरो
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बुंदेलखंड में एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। जांच की आधुनिक सुविधा एवं मेडिकल कॉलेज में डाट्स प्लस यूनिट खुलने के बाद विगत दो साल में रोगियों की संख्या ढाई सौ के पार हो गई है।
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टीबी रोग माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया से होता है। यह अत्यधिक संक्रामक बीमारी है। एक स्वस्थ व्यक्ति अगर टीबी रोगी के संपर्क में आता है, तो उसके रोग से ग्रसित होने की संभावना बढ़ जाती है। सामान्य तौर पर अस्सी प्रतिशत लोगों को टीबी फेफड़े में होती है, लेकिन दिमाग, गांठ व बोन टीबी भी काफी खतरनाक होती है। टीबी होने के बाद से मरीजों को छह माह तक डाट्स की दवाएं दी जाती हैं, लेकिन अगर कोई मरीज बीच में इलाज छोड़ देता है तो वह एमडीआर (मल्टीपल ड्रग रेजिस्टेंस) टीबी से ग्रसित हो जाता है। इसका इलाज बेहद जटिल व खर्चीला है।
सितंबर 2013 में महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में डाट्स प्लस यूनिट की स्थापना की गई। यहां पर एमडीआर मरीजों का नि:शुल्क इलाज किया जाता है। यहां आधुनिक जीन एक्सपर्ट विधि से मात्र तीन घंटे में नि:शुल्क मरीजों की जांच हो जाती है, जबकि प्राइवेट सेक्टर में इस जांच की कीमत हजारों रुपये है। डाट्स प्लस यूनिट की रिपोर्ट के अनुसार सन 2014 में 90 मरीजों का इलाज शुरू किया गया था, जबकि सन 2015 में अगस्त तक 163 मरीज भर्ती किए गए। चिकित्सकों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि एक एमडीआर रोगी हर साल पांच स्वस्थ व्यक्तियों को रोगी बनाता है।
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मरीजों की संख्या बढ़ने की मुख्य वजह जांच की आधुनिक सुविधा है। पहले की अपेक्षा अब कुछ ही घंटों में एमडीआर रोग की जांच हो जाती है। डाट्स प्लस यूनिट नहीं होने से भी मरीजों को दूसरे शहर जाना पड़ता था, जिनसे उनकी संख्या पता ही नहीं चलती थी।
- डा. मधुर्मय शास्त्री, विभागाध्यक्ष- टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग, महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज
लक्षण :
- लगातार दो सप्ताह तक खांसी
- रुक-रुक कर बुखार आना
- तेजी से वजन कम होना
- खांसते-खांसते दम घुटने लगना
- अत्यधिक बलगम आना
- खांसते समय मुंह से खून आना
बाक्स ...
टीबी रोग से बढ़ती है आत्महत्या की आदत
झांसी। एमडीआर टीबी के इलाज का सबसे खतरनाक पहलू इसका सुसाइड टेंडेंसी होना है, यानी रोगी इलाज के दौरान आत्महत्या के लिए प्रेरित होता है। यह एमडीआर की खास दवाओं के कारण होता है। इसलिए, इलाज के दौरान मरीजों को अत्यधिक भावनात्मक प्रेरणा एवं काउंसलिंग की जरूरत होती है। इलाज नहीं कराने वाला व्यक्ति भी अत्यधिक कमजोरी, परेशानी व अवसाद में होने के कारण आत्महत्या को प्रेरित होता है।
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लंबा इलाज और खर्चीला भी
झांसी। टीबी का सामान्य इलाज छह माह से एक साल तक का होता है। इसमें प्रतिदिन कई प्रकार की दवाएं खानी पड़ती हैं। एमडीआर का इलाज इससे भी खर्चीला है। सामान्य तौर पर दो से पांच लाख रुपये तक खर्च होते हैं। 50 प्रतिशत मरीज प्राइवेट सेक्टर में इलाज कराते हैं, यहां पर इलाज के दौरान थोड़ी सी भी राहत मिलने पर मरीज इलाज छोड़ देता है, जिससे वह एमडीआर टीबी से ग्रसित हो जाता है।
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आंकड़ों में टीबी ....
- हर साल दुनिया में 90 लाख लोगों को टीबी होता है।
- दुनिया में हर रोज 750 लोग टीबी से मरते हैं।
- भारत में 23 लाख टीबी रोग से पीड़ित हैं।
- भारत में हर साल तीन लाख लोग टीबी से मरते हैं।   
कुछ सामान्य भ्रांतियां ...
- टीबी रोग एक कलंक है।
- यह आनुवांशिक बीमारी है।
- यह रोग लाइलाज है।
- दवाओं का खर्च ज्यादा है।   
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